सोनम वांगचुक आज भी अपने अनशन पर डटे हुए हैं, लेकिन उनका कहना है कि यह लड़ाई किसी निजी फायदे के लिए नहीं है। वह न तो अपने लिए कोई कार, बंगला या दौलत मांग रहे हैं और न ही किसी पद की मांग कर रहे हैं। उनकी मांग सिर्फ इतनी है कि देश के भविष्य, युवाओं के सपनों और पर्यावरण जैसे अहम मुद्दों को नजरअंदाज न किया जाए और सरकार इस दिशा में अपनी जिम्मेदारी निभाए।
वांगचुक का कहना है कि यह संघर्ष आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों और उनके बेहतर भविष्य को लेकर है। वह चाहते हैं कि विकास के नाम पर प्रकृति और लोगों के हितों के साथ खिलवाड़ न हो। इसी मांग को लेकर वह लगातार अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे हैं।
सोनम वांगचुक के अनशन को लेकर अब राजनीतिक बहस भी तेज हो गई है। विपक्ष सरकार पर आरोप लगा रहा है कि वह युवाओं और जनता से जुड़े मुद्दों पर ध्यान देने के बजाय राजनीतिक समीकरणों में ज्यादा व्यस्त है। वहीं, सरकार की ओर से अब तक इस मामले में कोई बड़ी औपचारिक बातचीत सामने नहीं आई है।
इस बीच सोशल मीडिया पर लोग सोनम वांगचुक के आंदोलन की तुलना अन्ना हजारे के आंदोलन से भी कर रहे हैं। साल 2011 में अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ 11 दिनों तक अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल की थी, जिसके बाद तत्कालीन सरकार को बातचीत के लिए आगे आना पड़ा था।
अब सवाल उठ रहा है कि जब सोनम वांगचुक 17 दिनों से अनशन पर हैं, तो सरकार और आंदोलनकारी के बीच बातचीत क्यों नहीं हो रही है? उनके समर्थक लगातार मांग कर रहे हैं कि केंद्र सरकार को इस मुद्दे पर पहल करनी चाहिए और संवाद का रास्ता अपनाना चाहिए।
वहीं आलोचक सरकार पर निशाना साधते हुए कह रहे हैं कि सत्ता में बैठे लोगों को जनता के मुद्दों से ज्यादा राजनीतिक प्रबंधन की चिंता है। सोशल मीडिया पर कुछ लोग तंज कस रहे हैं कि सोनम वांगचुक ने शायद ऐसी सरकार चुन ली है जहां इस्तीफे नहीं, बल्कि सिर्फ तबादले होते हैं।
फिलहाल सोनम वांगचुक का आंदोलन एक बड़े सवाल के रूप में सामने खड़ा है कि क्या सरकार और जनता के बीच संवाद की जगह अब सिर्फ राजनीति ही रह गई है? आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि केंद्र सरकार इस मुद्दे पर क्या कदम उठाती है।
written by :- Anjali Mishra
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