सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम आदेश में दिल्ली-एनसीआर की सभी स्थानीय निकायों को दो हफ्ते के भीतर सड़कों से सभी आवारा कुत्तों को हटाने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने यह फैसला नागरिकों की सुरक्षा और बढ़ती डॉग-बाइट घटनाओं को देखते हुए सुनाया। आदेश में साफ कहा गया है कि इस दौरान किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी और स्थानीय निकायों को यह सुनिश्चित करना होगा कि निर्धारित समयसीमा में कार्रवाई पूरी हो। कोर्ट के इस रुख ने न सिर्फ प्रशासन को अलर्ट कर दिया है, बल्कि समाज के अलग-अलग वर्गों में इस पर तीखी बहस भी छिड़ गई है।
2019 में पशुपालन मंत्रालय द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 1.53 करोड़ से अधिक आवारा कुत्ते मौजूद हैं। इनमें उत्तर प्रदेश 20.6 लाख की संख्या के साथ सबसे ऊपर है। शहरीकरण और कचरे के बढ़ते ढेर ने इनकी संख्या में इजाफा किया है, क्योंकि खुले में पड़ा भोजन इनका मुख्य सहारा बनता है। दिल्ली-एनसीआर में भी पिछले कुछ वर्षों में आवारा कुत्तों की आबादी तेजी से बढ़ी है, जिससे रिहायशी इलाकों, पार्कों और सड़कों पर इनके झुंड आम नज़र आने लगे हैं।
कोर्ट के फैसले के बाद एनिमल लवर्स और पशु अधिकार कार्यकर्ता खासे चिंतित हैं। उनका कहना है कि सड़क से सभी कुत्तों को हटाना एक अमानवीय कदम साबित हो सकता है, अगर इनके लिए सुरक्षित आश्रय और उचित देखभाल का इंतज़ाम नहीं किया गया। वे इस बात पर जोर दे रहे हैं कि सरकार को स्ट्रे डॉग पॉपुलेशन कंट्रोल के लिए ‘कैप्चर, न्यूटर, वैक्सीनेट और रिलीज़’ जैसी मानवीय पद्धति अपनानी चाहिए, न कि अचानक इनको पकड़कर कहीं अज्ञात जगह पर छोड़ देना।
दूसरी ओर, स्थानीय अधिकारियों के सामने रोजाना पकड़े जाने वाले कुत्तों की संख्या मेंटेन करना एक बड़ी चुनौती है। इतने कम समय में हज़ारों कुत्तों को पकड़ना, उनके लिए अस्थायी शेल्टर की व्यवस्था करना और चिकित्सा सुविधाएं मुहैया कराना आसान काम नहीं है। इसके अलावा, स्टाफ, संसाधन और लॉजिस्टिक्स की कमी भी इस प्रक्रिया को जटिल बनाती है। कई निगम पहले से ही बजट की कमी और कर्मचारियों की घटती संख्या से जूझ रहे हैं।
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विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की समस्या का समाधान केवल आपातकालीन कदमों से नहीं होगा। इसके लिए लंबी अवधि की नीति की जरूरत है, जिसमें जन्म नियंत्रण कार्यक्रम, व्यापक वैक्सीनेशन, और कचरा प्रबंधन जैसे उपाय शामिल हों। साथ ही, लोगों में जागरूकता बढ़ाना भी जरूरी है, ताकि आवारा कुत्तों को अनियमित रूप से खिलाने और इनके लिए असुरक्षित माहौल बनाने से बचा जा सके।
आने वाले दो हफ्तों में यह देखना अहम होगा कि स्थानीय निकाय सुप्रीम कोर्ट के आदेश को कितनी कुशलता और मानवीय तरीके से लागू करते हैं। अगर यह प्रक्रिया बिना उचित योजना और संसाधन के चलाई गई, तो इससे न केवल कुत्तों की भलाई प्रभावित होगी, बल्कि शहर में कचरे और अन्य पर्यावरणीय समस्याओं में भी इजाफा हो सकता है। फिलहाल, दिल्ली-एनसीआर में यह मामला जनहित और पशु अधिकारों के बीच संतुलन बनाने की एक बड़ी परीक्षा बन गया है।
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