बिहार चुनाव के बाद पहली बार तेजस्वी यादव ने खुलकर अपनी चुप्पी तोड़ी और एक ऐसा बयान दिया जिसने राजनीतिक हलकों में फिर हलचल पैदा कर दी। उन्होंने साफ कहा कि महागठबंधन की हार दरअसल उनकी हार नहीं, बल्कि लोकतंत्र की हार है और सिस्टम की जीत। उनके अनुसार जिस तरह से चुनावी माहौल बनाया गया, जिस तरह की रणनीतियाँ अपनाई गईं, और जिस तरह की ताकतें चुनावी प्रक्रिया पर हावी रहीं वह पूरी कहानी खुद बयां करती हैं कि मुकाबला बराबरी का नहीं था। तेजस्वी ने यह भी संकेत दिया कि लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भरोसा रखने वाले लोग आज अपने आप को पहले से ज्यादा असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए तेजस्वी ने बीजेपी और उसके सहयोगी दलों पर निशाना साधा और कहा कि जीत हासिल करने के लिए उन्होंने हर तरीका इस्तेमाल किया। चुनाव आयोग से लेकर बूथ की बारीकियों तक, हर मोर्चे पर महागठबंधन को लड़ना पड़ा और असमान परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। तेजस्वी का कहना था कि लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब राजनीतिक मुकाबला निष्पक्ष हो, लेकिन बिहार में ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि एक तरफ राजनीति थी और दूसरी तरफ पूरा सिस्टम, और सिस्टम हमेशा ताकतवर पक्ष के साथ रहा।
तेजस्वी ने अपने भाषण में एक और बड़ा हमला उस तरीके पर किया जिसमें उनके चुनावी वादों को अब सरकार द्वारा लागू किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि उन्होंने जनता से वादा किया था कि पेंशन बढ़ाई जाएगी, माई-बहन मान योजना लाई जाएगी, और सामाजिक सुरक्षा की कई स्कीमें शुरू होंगी। लेकिन चुनाव हारने के बाद अब वही योजनाएँ सरकार लागू करने में लगी है, जिन पर पहले कभी विचार नहीं हुआ। तेजस्वी का कहना था, “20 साल में यह विचार कभी नहीं आया, लेकिन आज अचानक सब याद आ गया।” इससे उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि वास्तविक विजन और विचार महागठबंधन का था, लेकिन क्रेडिट सरकार ले रही है।
उन्होंने यह भी कहा कि जनता ने जिन मुद्दों पर भरोसा किया था, वे मुद्दे आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। बेरोज़गारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और महिलाओं की आर्थिक सुरक्षा जैसे विषयों पर उनका फोकस था और आज भी वही विषय चर्चा में हैं। तेजस्वी का दावा है कि अगर उनके सुझाव और योजनाएँ सरकार को अच्छी लग रही हैं, तो इसका मतलब यह है कि उनका विजन सही था। लेकिन उन्हें इस बात की पीड़ा है कि जनता को यह नहीं बताया जा रहा कि विचार किसका था और पहल किसने की।
तेजस्वी ने राजनीतिक नैरेटिव पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जिस तरह से उनके बयानों को तोड़ा-मरोड़ा गया और जिस तरह मीडिया का एक हिस्सा लगातार उनके खिलाफ नैरेटिव बनाता रहा, उसने भी चुनावी माहौल को प्रभावित किया। उन्होंने कहा कि बिहार की जनता बदलाव चाहती थी, लेकिन प्रचार और तंत्र के दबाव में असली मुद्दे कहीं पीछे रह गए। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए किसी भी तरह से स्वस्थ नहीं है और इससे आने वाले चुनावों पर भी प्रभाव पड़ेगा।
एक और दिलचस्प बात उन्होंने यह कही कि बिहार की राजनीति में विचारों की लड़ाई खत्म होती जा रही है और उसकी जगह रणनीति, मैनेजमेंट और सिस्टम का खेल चल रहा है। तेजस्वी बोले कि चुनाव ‘जनता बनाम व्यवस्था’ बन गया था और व्यवस्था जीत गई। चुनाव के बाद जिस तरह कई योजनाएँ जल्दबाज़ी में घोषित की जा रही हैं, वह भी इस बात की पुष्टि करता है कि सत्ता सिर्फ कुर्सी से नहीं चलती, बल्कि जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने से चलती है।
तेजस्वी ने अपने समर्थकों को भी संदेश दिया कि उन्हें निराश होने की जरूरत नहीं है। असली लड़ाई अभी भी जारी है और जनता हमेशा सच को पहचानती है। उन्होंने कहा कि विचार किसी का भी रोका नहीं जा सकता। अगर सरकार आज वही योजनाएँ लागू कर रही है जिनका वादा महागठबंधन ने किया था, तो यह इस बात का सबूत है कि जनता ने उनकी बात सुनी, समझी और शायद सरकार ने भी दबाव में उनकी योजनाओं को अपनाया।
अंत में तेजस्वी यादव ने अपनी बात को एक वाक्य में समेटा “विजन हमारा, फायदा किसी और का।” यह लाइन सिर्फ एक तंज नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति की मौजूदा तस्वीर का सटीक सार लगती है। उनके बयान से साफ है कि वह अभी भी मैदान में हैं, उनकी लड़ाई संस्थागत पक्षपात के खिलाफ है, और उनका दावा है कि आने वाली लड़ाइयाँ विचारों की होंगी, जिससे जनता का असली भला होगा।
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