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20 साल बाद एक मंच पर ठाकरे बंधु: ‘मराठी अस्मिता’ ने जोड़ी दो राजनीतिक धाराओं को

मुंबई – महाराष्ट्र की राजनीति में आज एक ऐतिहासिक मोड़ आया जब शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) प्रमुख राज ठाकरे 20 साल बाद एक ही मंच पर नज़र आए। यह पुनर्मिलन ‘मराठी विजय दिवस रैली’ में हुआ, जो राज्य की राजनीति में संभावित गठबंधन की भूमिका तैयार कर रहा है।

राजनीतिक दूरी और फिर नजदीकी

राज ठाकरे ने 2006 में मतभेद के चलते शिवसेना से अलग होकर मनसे बनाई थी। हालांकि, समय के साथ दोनों दल कमजोर होते गए—शिवसेना यूबीटी विभाजन से और मनसे जनसमर्थन की कमी से। ऐसे में ‘मराठी अस्मिता’ को केंद्र में रखते हुए एक नई एकता की पटकथा लिखी जा रही है।

तीन भाषा फार्मूले से मिली एकजुटता की जमीन

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राज्य सरकार के हिंदी भाषा को अनिवार्य करने वाले तीन भाषा फार्मूले ने दोनों पार्टियों को एक मंच पर आने का कारण दिया। पहले विरोध और फिर सरकार द्वारा यह निर्णय वापस लेने के बाद, मनसे और शिवसेना यूबीटी ने इसे “मराठी एकता की जीत” बताया और 5 जुलाई को साझा रैली का ऐलान किया।

इतिहास की एक झलक

राज-उद्धव आखिरी बार 2005 में मालवण उपचुनाव में एक साथ मंच पर दिखे थे। हालांकि, नारायण राणे उस चुनाव में भारी जीत के साथ सामने आए थे। तब से दोनों भाइयों के रास्ते अलग हो गए थे। लेकिन राज ठाकरे के हालिया पॉडकास्ट इंटरव्यू और उद्धव ठाकरे की सकारात्मक प्रतिक्रिया ने पुनर्मिलन की बुनियाद रखी।

घोषणाओं और शर्तों की सियासत

जहां शिवसेना यूबीटी के संजय राउत ने कहा कि पार्टी ‘दिल से’ गठबंधन को तैयार है, वहीं मनसे नेता संदीप देशपांडे ने स्पष्ट किया कि प्रस्ताव मजबूत और स्पष्ट होना चाहिए, क्योंकि पिछली बार पार्टी को धोखे मिले हैं।

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अब अग्निपरीक्षा लोकल चुनावों की

मुंबई, पुणे, ठाणे और नागपुर जैसे शहरों में इस साल के अंत में होने वाले नगर निगम चुनाव दोनों दलों के गठबंधन की लिटमस टेस्ट साबित होंगे। एक तरफ राज ठाकरे की आक्रामक शैली है, दूसरी ओर उद्धव की सर्वसमावेशी राजनीति—इस अंतर को पाटना संगठनात्मक रूप से भी चुनौती होगा।

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