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625 KM साइकिल चलाकर पहुंची बच्ची लौटा दी गई !

मध्य प्रदेश के जबलपुर की रहने वाली कक्षा 12 की छात्रा आयुषी कुशवाहा ने ऐसा कदम उठाया, जिसे सुनकर हर कोई हैरान रह गया। सिर्फ 17 साल की उम्र में आयुषी ने 625 किलोमीटर की लंबी साइकिल यात्रा तय की, वो भी केवल एक ही उद्देश्य से — बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सुप्रीमो मायावती से मिलने और उन्हें अपनी प्रेरणा मानकर धन्यवाद देने। यह यात्रा न सिर्फ शारीरिक रूप से चुनौतीपूर्ण थी, बल्कि आत्मबल, साहस और समर्पण की मिसाल भी थी।

आयुषी का सपना था कि वह मायावती जी से आमने-सामने मिलकर अपने विचार साझा कर सके और उनके संघर्षों से प्रेरणा लेने के लिए व्यक्तिगत रूप से उन्हें धन्यवाद दे। उन्होंने न दिन देखा न रात, गर्मी और थकावट की परवाह किए बिना अकेले यह यात्रा पूरी की। लेकिन जब वह लखनऊ पहुंचीं और बसपा के प्रदेश कार्यालय में मायावती जी से मिलने की कोशिश की, तो उन्हें महज़ “प्रोटोकॉल” का हवाला देकर लौटा दिया गया।

यही वह मोड़ था, जहाँ इस कहानी ने भावुकता से कटु वास्तविकता की ओर मोड़ लिया। सवाल उठता है कि जब कोई युवा इतने सम्मान और श्रद्धा के साथ, बिना कोई मांग किए सिर्फ मिलने आता है, तो क्या राजनीति की दीवारें इतनी ऊंची हो जाती हैं कि उसमें संवेदनाएं जगह नहीं बना पातीं? क्या यह प्रोटोकॉल उस इंसानियत से बड़ा हो गया है, जो एक किशोरी के जज़्बे के सामने बौना पड़ता है?

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बसपा के पदाधिकारियों का कहना है कि सुरक्षा और संगठनात्मक नियमों के चलते बिना पूर्व सूचना के किसी को भी वरिष्ठ नेताओं से मिलने की इजाज़त नहीं दी जा सकती। लेकिन यह तर्क तब फीका पड़ जाता है जब सामने एक छात्रा खड़ी हो, जिसने मीलों का सफर तय करके यह जताया हो कि आज की पीढ़ी भी किसी नेता को अपना आदर्श मानती है।

आयुषी को वापस भेज दिया गया, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है — क्या राजनीति अब इंसानों से नहीं, केवल सिस्टम से चलती है? और क्या नेता, जिनके संघर्षों से लाखों लोग प्रेरणा लेते हैं, अब आम लोगों से इतनी दूरी बना चुके हैं कि उनकी भावना तक उन तक नहीं पहुंच पाती?

इस घटना ने भले ही आयुषी को मायावती जी से मिलने का अवसर नहीं दिया हो, लेकिन उसके साहस और संकल्प ने देशभर के युवाओं के दिलों को जरूर छू लिया है। वह खुद आज उन लाखों लड़कियों के लिए प्रेरणा बन गई है जो बदलाव की राह पर चलना चाहती हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि नेता और दल इस घटना से कुछ सीखेंगे — और अगली बार जब कोई आयुषी जैसा सपना लेकर किसी दरवाजे पर दस्तक दे, तो उसे “प्रोटोकॉल” नहीं, स्वागत मिले।

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