दुनिया भर में सैन्य ठिकानों की स्थापना किसी भी देश की रणनीतिक और सुरक्षा नीति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा होती है, और भारत भी इस दिशा में लगातार मजबूत कदम उठा रहा है। हाल ही में ईरान-इजराइल संघर्ष के दौरान कतर स्थित अमेरिकी एयरबेस पर हुए हमले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर विदेशी धरती पर सैन्य अड्डों की आवश्यकता क्यों पड़ती है। सैन्य अड्डे महज सैनिकों और हथियारों के जमावड़े की जगह नहीं होते, बल्कि ये युद्ध की स्थिति में तत्परता बनाए रखने, सहयोगी देशों को सहायता देने, समुद्री और हवाई सीमाओं की निगरानी करने, आपदा प्रबंधन में तेजी से कार्रवाई करने, और वैश्विक स्तर पर राजनीतिक-सामरिक दबाव बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी होते हैं। यही कारण है कि अमेरिका, रूस, चीन और ब्रिटेन जैसे देश दुनिया के दर्जनों क्षेत्रों में अपने सैन्य अड्डे संचालित कर रहे हैं। भारत, जो अब एक उभरती हुई वैश्विक शक्ति है, अपनी सामरिक पहुँच को सीमाओं से बाहर तक विस्तारित कर चुका है। ताजिकिस्तान का फारखोर एयरबेस भारत का पहला और अत्यंत अहम विदेशी एयरबेस है, जो अफगानिस्तान के समीप स्थित होने के कारण मध्य एशिया में भारत की रणनीतिक पकड़ को मजबूत करता है। इसके अलावा भूटान में मौजूद इंडियन मिलिट्री ट्रेनिंग टीम (IMTRAT) न केवल भूटानी सेना को प्रशिक्षण देती है, बल्कि भारत-भूटान रक्षा साझेदारी को भी सुदृढ़ करती है।
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हिंद महासागर में अपनी मौजूदगी को सुरक्षित रखने के लिए भारत ने मॉरीशस में एक महत्वपूर्ण नौसैनिक ठिकाना विकसित किया है, जिससे वह समुद्री व्यापार मार्गों और चीनी गतिविधियों पर निगरानी रख सकता है। ओमान में रस अल हद्द और डुक्म जैसे स्थानों पर भारत की लॉजिस्टिक और मरम्मत सुविधाएं मौजूद हैं, जो नौसेना और वायुसेना की लंबी दूरी तक पहुंचने की क्षमता को बढ़ाती हैं। वहीं, सिंगापुर के चांगी नेवल बेस के माध्यम से भारत मलक्का जलडमरूमध्य जैसे अत्यंत संवेदनशील समुद्री मार्गों पर नजर रखता है, जो वैश्विक व्यापार के लिए जीवनरेखा माने जाते हैं। इन सभी अड्डों के जरिये भारत अब एक ऐसी स्थिति में है जहाँ वह न केवल अपनी सीमाओं की रक्षा कर सकता है, बल्कि जरूरत पड़ने पर वैश्विक घटनाओं में हस्तक्षेप या समर्थन भी दे सकता है। दुनिया भर में बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों और चीन-पाकिस्तान जैसी दोहरी चुनौतियों के बीच भारत की यह रणनीतिक तैयारी उसकी रक्षा नीतियों को नई दिशा देती है और उसे एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करती है।
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