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यूपी की सियासत में ठाकुरवाद बनाम गैरठाकुर रणनीति !

उत्तर प्रदेश की राजनीति में पिछले कुछ दिनों से ठाकुर नेताओं की सक्रियता और उनकी एकजुटता सुर्खियों में बनी हुई है। इसी क्रम में ठाकुर विधायकों की बैठक के बाद अब डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य और ब्रजेश पाठक की मुलाकात ने नई हलचल पैदा कर दी है। यह मुलाकात लखनऊ स्थित मौर्य के आवास पर हुई, जिसे दोनों नेताओं ने महज शिष्टाचार भेंट बताया, लेकिन सियासी गलियारों में इसके मायने कहीं ज्यादा गहरे निकाले जा रहे हैं।

ठाकुर विधायकों की हालिया बैठक के बाद से राजनीतिक संदेश साफ है कि वे अपनी ताकत दिखाना चाहते हैं। ऐसे में गैरठाकुर नेताओं की रणनीतिक मुलाकात को संतुलन साधने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बैठक ठाकुर नेताओं की बढ़ती सक्रियता के बीच भाजपा संगठन और सरकार में शक्ति संतुलन बनाए रखने की कवायद का हिस्सा है।

डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य और ब्रजेश पाठक, दोनों ही ओबीसी और ब्राह्मण समुदाय से आते हैं। यह मुलाकात संकेत देती है कि भाजपा के भीतर ठाकुर वर्चस्व के खिलाफ एक समानांतर ध्रुव तैयार करने की रणनीति बन रही है। पार्टी के भीतर जातीय समीकरणों को साधना हमेशा से अहम रहा है और 2024 के बाद 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारी में यह संतुलन और ज्यादा मायने रखेगा

इसी बीच, राजा भैया की संभावित एंट्री ने भी सियासी पारा चढ़ा दिया है। राजा भैया लंबे समय से ठाकुर राजनीति के बड़े चेहरे माने जाते हैं और अगर वे भाजपा खेमे में एंट्री करते हैं तो यह ठाकुरवाद को और मजबूती देगा। यही वजह है कि गैरठाकुर नेता पहले से ही अपनी रणनीति बनाते हुए दिखाई दे रहे हैं ताकि संतुलन बिगड़ने से पहले ही राजनीतिक समीकरण को दुरुस्त किया जा सक

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प्रदेश की राजनीति में ठाकुरवाद को लेकर उठ रहे सवाल भाजपा के लिए किसी चुनौती से कम नहीं हैं। पार्टी का मूल वोटबैंक केवल ठाकुर समाज तक सीमित नहीं है, बल्कि ब्राह्मण, ओबीसी और दलित वोट भी इसमें निर्णायक भूमिका निभाते हैं। ऐसे में ठाकुर नेताओं की एकजुटता अगर अन्य जातीय समूहों को हाशिये पर धकेलती है तो इसका नुकसान सत्ताधारी पार्टी को उठाना पड़ सकता है।

सियासी जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में भाजपा के भीतर ही “ठाकुर बनाम गैरठाकुर” की राजनीति और ज्यादा खुलकर सामने आ सकती है। केशव प्रसाद मौर्य और ब्रजेश पाठक की मुलाकात इसी दिशा में पहला संकेत मानी जा रही है। अब देखना यह होगा कि पार्टी नेतृत्व इस जातीय खींचतान को किस तरह संतुलित करता है और विपक्ष इस सियासी हलचल का कितना फायदा उठाने में कामयाब होता है।

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