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गोंडा में राष्ट्रकथा के मंच पर भावुक पल, बृज भूषण शरण सिंह की आंखें हुईं नम !

उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में बीजेपी के पूर्व सांसद बृज भूषण शरण सिंह के नंदिनी निकेतन में चल रहे 8 दिवसीय राष्ट्रकथा कार्यक्रम के दौरान एक ऐसा भावुक क्षण सामने आया, जिसने वहां मौजूद हर व्यक्ति का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। यह कार्यक्रम पहले से ही धार्मिक और राष्ट्रभाव से भरा हुआ था, लेकिन कथा के बीच आया यह पल लोगों के दिलों में लंबे समय तक बस जाने वाला बन गया।

कथा के दौरान मंच से कथावाचक सतगुरु रितेश्वर महाराज जब भावुक हुए, तो उन्होंने बृज भूषण शरण सिंह की ओर इशारा करते हुए कहा, “मैं इनका बाप हूं, मेरा भी दबदबा था, है और रहेगा।” उनके ये शब्द सिर्फ एक वाक्य नहीं थे, बल्कि भावनाओं और आत्मविश्वास से भरी एक गूंज थी, जिसने पूरे पंडाल का माहौल बदल दिया।

इतना सुनते ही मंच पर बैठे बृज भूषण शरण सिंह की आंखें भर आईं। उनके चेहरे पर भावनाओं का सैलाब साफ नजर आने लगा। यह दृश्य दिखा रहा था कि राजनीतिक जीवन में सख्त और दबंग छवि रखने वाले नेता भी भावनात्मक रूप से कितने संवेदनशील हो सकते हैं।

मंच पर बैठे अन्य लोग और कथा सुनने आए श्रद्धालु भी इस दृश्य को देखकर भावुक हो गए। कुछ पल के लिए पूरा वातावरण शांत हो गया और हर नजर मंच पर टिकी रह गई। यह क्षण केवल शब्दों का नहीं, बल्कि सम्मान, संबंध और भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक बन गया।

नंदिनी निकेतन में चल रहा यह राष्ट्रकथा कार्यक्रम पहले ही लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। आठ दिनों तक चलने वाले इस आयोजन में राष्ट्र, संस्कृति और धर्म से जुड़े विषयों पर कथाएं सुनाई जा रही हैं, जिन्हें सुनने के लिए दूर-दराज से लोग पहुंच रहे हैं।

इस भावुक पल ने कार्यक्रम की गरिमा को और बढ़ा दिया। सतगुरु रितेश्वर महाराज के शब्दों ने यह साफ कर दिया कि यह मंच केवल कथा कहने का नहीं, बल्कि भावनाओं और रिश्तों को जोड़ने का भी स्थान है। यही वजह है कि यह दृश्य वहां मौजूद लोगों के लिए बेहद यादगार बन गया।

बृज भूषण शरण सिंह के चेहरे पर छलके आंसू उनके राजनीतिक सफर और निजी संघर्षों की भी झलक दे रहे थे। यह क्षण यह बताने के लिए काफी था कि सत्ता और ताकत के पीछे भी एक इंसान होता है, जिसकी भावनाएं सम्मान और अपनापन पाकर छलक उठती हैं।

कार्यक्रम के दौरान मौजूद लोगों ने बाद में इस पल को सोशल मीडिया पर भी साझा किया, जिससे यह दृश्य तेजी से वायरल हो गया। लोगों ने इसे मानवीय संवेदनाओं और सम्मान का प्रतीक बताते हुए सराहा।

कुल मिलाकर, गोंडा में हुए इस राष्ट्रकथा कार्यक्रम का यह भावुक क्षण केवल एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहा, बल्कि लोगों के दिलों में गहरी छाप छोड़ गया। यह पल यह याद दिलाने वाला बन गया कि शब्दों की ताकत और सम्मान की भावना किसी को भी भावुक कर सकती है, चाहे वह कितना ही मजबूत या प्रभावशाली क्यों न हो।

written by :- Anjali Mishra

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