उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव भले ही अभी दूर हों, लेकिन सियासी तापमान अभी से चढ़ने लगा है। राजधानी लखनऊ की दीवारें एक बार फिर राजनीति का कैनवास बन गई हैं—जहां सत्ता और विपक्ष की जंग अब पोस्टरों के ज़रिये लड़ी जा रही है।
ताज़ा मामला समाजवादी पार्टी (सपा) के पोस्टर वॉर से जुड़ा है। “फर्क साफ है” के स्लोगन के साथ एक पोस्टर में एक बच्ची किताबों से भरा बैग लेकर भागती दिखाई दे रही है, जैसे बुलडोज़र की धमकी से खुद को बचा रही हो। वहीं दूसरी तस्वीर में वही बच्ची सपा प्रमुख अखिलेश यादव से किताबों से भरा बैग पाकर मुस्कराती नज़र आ रही है—यह सीधा-सीधा संदेश है कि ‘बुलडोज़र राज’ में शिक्षा खतरे में है, और सपा ही उसका विकल्प है।
सिर्फ लखनऊ ही नहीं, झांसी, अमेठी और कई अन्य जिलों में भी ऐसे पोस्टर लगाए गए हैं। झांसी में सपा के जिला अध्यक्ष ने अखिलेश यादव को ‘पीडीए का रक्षक’ बताते हुए नया नारा उछाला है—जिसमें ‘90 बनाम 10’ की लड़ाई की बात खुलकर कही गई है।
क्या है ‘पीडीए’ और क्यों बन रहा है चुनावी हथियार?
पीडीए यानी ‘पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक’। यह वही वर्ग है जिसे समाजवादी पार्टी ने अपने नए वोट बैंक के तौर पर चिन्हित किया है। ’90 बनाम 10′ का मतलब—वो 90% आबादी जो सपा के मुताबिक सामाजिक रूप से वंचित है और जिसे बीजेपी शासन में हाशिये पर धकेला गया है।
अखिलेश यादव इस नैरेटिव को चुनावी जमीन पर ले जाने की रणनीति बना चुके हैं, और अब उसका प्रदर्शन पोस्टर वॉर के रूप में हो रहा है। वहीं बीजेपी इसे तुष्टिकरण की राजनीति बताकर सपा को कटघरे में खड़ा कर रही है।
दीवारों पर पोस्टर, लेकिन निशाना 2027 की कुर्सी!
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 के चुनाव में मुद्दे केवल विकास और कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रहने वाले। पहचान, प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय की राजनीति एक बार फिर केंद्र में आ रही है। और सपा इसे ‘पीडीए’ के नाम पर पुनर्परिभाषित करने में जुट गई है।
फिलहाल बीजेपी की ओर से इन पोस्टरों पर कोई सीधी प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन अतीत की तरह यह तय माना जा रहा है कि जल्द ही पलटवार होगा—शायद एक और पोस्टर या फिर बुलडोज़र की कोई नई राजनीतिक स्कीम के साथ।सवाल बड़ा है: 2027 की सियासत में असली ‘फर्क’ कौन लाएगा—बुलडोज़र या बैग?

