देश में भाषा और लिपि को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। इस बार मामला Indian Institute of Mass Communication यानी IIMC से जुड़ा है, जहां उर्दू पत्रकारिता प्रवेश परीक्षा की लिपि को लेकर विवाद दिल्ली हाई कोर्ट तक पहुंच गया है।
मामले की सुनवाई के दौरान IIMC ने Delhi High Court में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 343 केवल संघ की राजभाषा से संबंधित है और इससे किसी भी अभ्यर्थी को उर्दू पत्रकारिता की प्रवेश परीक्षा देवनागरी लिपि में कराने का अधिकार स्वतः नहीं मिल जाता।
संस्थान ने स्पष्ट रूप से कहा कि उर्दू भाषा की अपनी अलग लिपि है और उसी के आधार पर परीक्षा आयोजित की जाती है। IIMC का तर्क है कि किसी भी शैक्षणिक संस्थान को अपनी प्रवेश परीक्षा की भाषा और लिपि तय करने का अधिकार होना चाहिए।
यह विवाद केवल एक परीक्षा तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि अब भाषा, लिपि और संवैधानिक अधिकारों को लेकर व्यापक चर्चा का विषय बनता जा रहा है। हिंदी और उर्दू को लेकर सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर पहले भी कई बार बहस होती रही है, लेकिन अब यह मुद्दा कानूनी बहस के केंद्र में पहुंच गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत जैसे बहुभाषी देश में भाषा और लिपि का प्रश्न केवल शैक्षणिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़ा होता है। यही वजह है कि इस मामले को लेकर अलग-अलग पक्षों की राय सामने आ रही है।
कुछ लोगों का कहना है कि देवनागरी लिपि में परीक्षा की मांग भाषाई सुविधा से जुड़ी हो सकती है, जबकि दूसरी ओर यह तर्क भी दिया जा रहा है कि किसी भाषा की मूल लिपि को बनाए रखना उसकी पहचान और परंपरा का हिस्सा है।
IIMC की ओर से दिए गए इस बयान के बाद अब पूरे मामले पर कानूनी और शैक्षणिक दोनों स्तरों पर चर्चा तेज हो गई है। कई लोग इसे भाषा नीति और शिक्षा संस्थानों की स्वायत्तता से जोड़कर भी देख रहे हैं।
फिलहाल अब सबकी नजर दिल्ली हाई कोर्ट के अगले फैसले पर टिकी है, क्योंकि यह मामला भविष्य में भाषा और लिपि से जुड़े अन्य शैक्षणिक विवादों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा सकता है।
written by:- Anjali Mishra
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