भारत की मुद्रा स्थिति को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है, क्योंकि पिछले एक दशक में भारतीय रुपये और अमेरिकी डॉलर के बीच विनिमय दर में बड़ा बदलाव देखा गया है। Indian Rupee और US Dollar के बीच यह बदलाव अब आर्थिक बहस का केंद्र बन गया है।
2014 में जब Narendra Modi पहली बार प्रधानमंत्री बने थे, उस समय एक डॉलर की कीमत लगभग 59 रुपये के आसपास थी। उस दौर में रुपये की स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत मानी जाती थी और वैश्विक बाजार में भारत की आर्थिक स्थिति स्थिरता की ओर बढ़ रही थी।
2019 तक आते-आते यह दर बढ़कर करीब 69 रुपये प्रति डॉलर के स्तर तक पहुंच गई। इस दौरान वैश्विक व्यापार तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक परिस्थितियों का असर भारतीय मुद्रा पर भी देखा गया।
इसके बाद 2024 में तीसरे कार्यकाल की शुरुआत तक डॉलर के मुकाबले रुपया लगभग 83 रुपये के स्तर पर पहुंच गया। यह वह दौर था जब वैश्विक महंगाई, सप्लाई चेन संकट और ऊर्जा कीमतों में अस्थिरता का असर कई देशों की मुद्राओं पर दिखाई दिया।
अब तीसरे कार्यकाल के दो साल बाद रुपये की कीमत करीब 96 प्रति डॉलर बताई जा रही है, जिससे यह बहस फिर तेज हो गई है कि मुद्रा में यह गिरावट किन कारणों से हुई।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इसे केवल घरेलू नीतियों से जोड़कर देखना सही नहीं होगा। इसके पीछे वैश्विक कारक जैसे अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतें, डॉलर की मजबूती, वैश्विक ब्याज दरें और विदेशी निवेश का प्रवाह भी बड़ी भूमिका निभाते हैं।
कई विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ने के बावजूद डॉलर के मुकाबले मुद्रा पर दबाव बना रहता है, क्योंकि वैश्विक व्यापार में डॉलर की भूमिका अभी भी प्रमुख बनी हुई है।
इस पूरे मुद्दे ने एक बार फिर आर्थिक नीतियों, वैश्विक प्रभावों और मुद्रा स्थिरता को लेकर नई बहस छेड़ दी है, जहां अलग-अलग पक्ष अपने-अपने तर्कों के साथ सामने आ रहे हैं।
written by:- Anjali Mishra
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