अयोध्या के राम मंदिर से जुड़े चढ़ावा और दान प्रबंधन विवाद में हर दिन नए खुलासे और नए सवाल सामने आ रहे हैं। अब इस पूरे मामले में 60 किलो चांदी की उन शिलाओं का मुद्दा सबसे बड़ी पहेली बनकर उभरा है, जिन्हें श्रद्धालुओं और संस्थाओं द्वारा रामलला को भेंट किए जाने का दावा किया गया था। SIT की जांच के दौरान इन शिलाओं का रिकॉर्ड, वर्तमान स्थिति और संरक्षण व्यवस्था स्पष्ट रूप से सामने नहीं आ सकी है, जिससे जांच एजेंसियों की चिंता और बढ़ गई है। करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े इस मामले में अब हर तथ्य को बारीकी से खंगाला जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार, जांच टीम को अब तक ऐसा कोई स्पष्ट दस्तावेज नहीं मिला है जिससे यह पता चल सके कि चांदी की शिलाएं वर्तमान में कहां सुरक्षित हैं या उन्हें किस प्रक्रिया के तहत संरक्षित किया गया। दूसरी ओर ज्वेलर्स एसोसिएशन का दावा है कि ये शिलाएं ट्रस्ट को विधिवत रसीद और आवश्यक दस्तावेजों के साथ सौंपी गई थीं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि शिलाएं वास्तव में ट्रस्ट को प्राप्त हुई थीं, तो उनका पूरा रिकॉर्ड और वर्तमान स्थिति तुरंत उपलब्ध क्यों नहीं हो पा रही है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए SIT पुजारियों, कर्मचारियों और उन लोगों से पूछताछ कर रही है जो किसी न किसी रूप में चढ़ावे के संग्रह, भंडारण और रिकॉर्डिंग प्रक्रिया से जुड़े रहे हैं। जांच एजेंसियां यह समझने का प्रयास कर रही हैं कि दान स्वरूप प्राप्त कीमती वस्तुओं का रिकॉर्ड किस तरह रखा जाता था और क्या उस व्यवस्था में कहीं कोई कमी या अनियमितता थी। यही कारण है कि जांच अब केवल नकदी तक सीमित नहीं रही बल्कि सोना, चांदी, बहुमूल्य वस्तुएं और अन्य दान सामग्री भी जांच के दायरे में आ गई हैं।
इसी बीच SIT ने जांच को और प्रभावी बनाने के लिए एक बड़ा प्रशासनिक कदम उठाया है। बताया जा रहा है कि ट्रस्ट पदाधिकारियों और जांच के घेरे में आए कुछ संदिग्ध कर्मियों के अयोध्या जिले से बाहर जाने पर रोक लगा दी गई है। जांच एजेंसी का मानना है कि मामले से जुड़े सभी प्रमुख व्यक्तियों की उपलब्धता सुनिश्चित करना आवश्यक है ताकि किसी भी समय पूछताछ या दस्तावेजी सत्यापन किया जा सके।
छह दिनों तक चली गहन पड़ताल के बाद SIT ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट भी तैयार कर ली है। रिपोर्ट में दानपात्रों से प्राप्त धनराशि के उपयोग, कथित अनावश्यक खर्चों, दान प्रबंधन प्रणाली और भूमि खरीद से जुड़े कई पहलुओं की जांच की गई है। सूत्रों का दावा है कि जांच टीम ने वर्ष 2021 तक के रिकॉर्ड भी खंगाले हैं और कई बैंक अधिकारियों से पूछताछ कर वित्तीय लेनदेन की जानकारी जुटाई है।
जांच का दायरा बढ़ने के साथ अब पुराने निर्णयों और वित्तीय प्रक्रियाओं की भी समीक्षा की जा रही है। SIT यह समझने का प्रयास कर रही है कि दान की राशि के प्रबंधन के लिए बनाए गए नियमों का पालन किस हद तक हुआ और क्या कहीं ऐसी व्यवस्थागत खामियां थीं जिनका फायदा उठाया जा सकता था। यही वजह है कि जांच अब केवल हालिया घटनाओं तक सीमित न रहकर कई वर्षों के रिकॉर्ड तक पहुंच चुकी है।
इस बीच विवाद ने एक नया सामाजिक और राजनीतिक मोड़ भी ले लिया है। संतोष दुबे ने दावा किया है कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की वर्तमान संरचना में राजपूत समाज का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। उनका कहना है कि राम मंदिर आंदोलन में विभिन्न समाजों, विशेष रूप से राजपूत समुदाय ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, इसलिए ट्रस्ट में सभी प्रमुख समाजों की भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। इस मांग के बाद ट्रस्ट की संरचना और प्रतिनिधित्व को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।
कुछ सामाजिक संगठनों का मानना है कि धार्मिक संस्थाओं में व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व से पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ सकती है, जबकि दूसरे पक्ष का तर्क है कि ट्रस्ट का गठन निर्धारित नियमों और प्रक्रियाओं के अनुसार हुआ है। ऐसे में यह बहस अब केवल दान और चढ़ावे तक सीमित नहीं रह गई बल्कि ट्रस्ट की संरचना, निर्णय प्रक्रिया और सामाजिक सहभागिता तक पहुंच गई है।
फिलहाल राम मंदिर से जुड़े इस पूरे प्रकरण में कई सवालों के जवाब अभी बाकी हैं। 60 किलो चांदी की शिलाओं का रहस्य, दान प्रबंधन की पारदर्शिता, भूमि खरीद के पुराने मामलों की जांच और ट्रस्ट की संरचना को लेकर उठ रहे सवाल आने वाले दिनों में और बड़ा राजनीतिक तथा सामाजिक मुद्दा बन सकते हैं। अब सबकी नजर SIT की अंतिम रिपोर्ट पर है, जिससे यह तय होगा कि आरोपों में कितनी सच्चाई है और क्या किसी स्तर पर जवाबदेही तय की जाएगी।
written by:- Anjali Mishra
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