अयोध्या इन दिनों केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं बल्कि कई बड़े विवादों और सवालों का केंद्र भी बनता जा रहा है। एक ओर करोड़ों रुपये की लागत से शुरू की गई वॉटर मेट्रो परियोजना ठप पड़ी है, तो दूसरी ओर राम मंदिर के चढ़ावे, दान और वित्तीय प्रबंधन को लेकर चल रही जांच लगातार नए मोड़ ले रही है। इन घटनाओं ने न केवल प्रशासन बल्कि श्रद्धालुओं और आम लोगों के बीच भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
राम मंदिर उद्घाटन के बाद पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू की गई वॉटर मेट्रो परियोजना को अयोध्या की नई पहचान के रूप में पेश किया गया था। करीब 12 करोड़ रुपये की लागत से कोच्चि से लाई गई यह सेवा राम घाट से गुप्तार घाट तक लगभग 14 किलोमीटर की दूरी तय करने वाली थी। लेकिन शुरुआत के कुछ समय बाद ही इसका संचालन सीमित होता गया और यह दायरा घटकर महज 2 किलोमीटर तक सिमट गया। कभी जलस्तर कम होने तो कभी अधिक होने का हवाला दिया गया, जिसके चलते सेवा बार-बार बाधित होती रही।
स्थिति अब यह है कि पिछले तीन महीनों से वॉटर मेट्रो एक ही स्थान पर खड़ी बताई जा रही है। स्थानीय लोगों और पर्यटकों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी परियोजना का लाभ क्यों नहीं मिल पा रहा है। जानकारों का मानना है कि संचालन संबंधी तकनीकी चुनौतियों के अलावा किराया भी एक बड़ी वजह हो सकता है। पहले जब परियोजना पर्यटन विभाग के अधीन थी तब टिकट करीब 150 रुपये था, लेकिन निजी कंपनी को संचालन सौंपे जाने के बाद किराया लगभग दोगुना हो गया, जिससे यात्रियों की संख्या प्रभावित होने की चर्चा है।
उधर राम मंदिर चढ़ावा और दान प्रबंधन विवाद में जांच लगातार तेज होती जा रही है। जांच एजेंसी द्वारा की जा रही पड़ताल के बीच पहला बड़ा प्रशासनिक कदम उठाते हुए चढ़ावे की नियमित गणना में लगे लगभग 40 कर्मचारियों को ड्यूटी से हटा दिया गया है। उनकी जगह बैंक और ट्रस्ट की ओर से नए कर्मचारियों की नियुक्ति की गई है। इस कदम को जांच प्रक्रिया के दौरान पारदर्शिता सुनिश्चित करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार SIT ने अपनी जांच का दायरा केवल नकदी तक सीमित नहीं रखा है। कथित चढ़ावा गड़बड़ियों, वित्तीय प्रबंधन और भूमि खरीद से जुड़े मामलों की भी गहन पड़ताल की जा रही है। बताया जा रहा है कि कई अधिकारी अभी भी अयोध्या में मौजूद हैं और रिकॉर्ड, दस्तावेज तथा संबंधित लोगों के बयान जुटाने का काम जारी है। ट्रस्ट से जुड़े कुछ पदाधिकारियों को भी अयोध्या न छोड़ने के निर्देश दिए जाने की चर्चा है।
जांच के बीच यह भी कहा जा रहा है कि SIT अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री Yogi Adityanath को सौंप सकती है। रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई और संभावित कानूनी कदमों को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं। सूत्रों के हवाले से यह भी चर्चा है कि यदि जांच में पर्याप्त आधार मिले तो कथित रूप से शामिल लोगों के खिलाफ FIR दर्ज हो सकती है। हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक घोषणा अभी सामने नहीं आई है।
इसी बीच विवाद में एक और नया दावा सामने आया है जिसने बहस को और तेज कर दिया है। सिंधी समाज के कुछ प्रतिनिधियों ने दावा किया है कि राम मंदिर के लिए लगभग 200 किलो चांदी दान में दी गई थी, लेकिन इस दान का कोई स्पष्ट रिकॉर्ड या आधिकारिक रसीद उपलब्ध नहीं है। दावा यह भी किया गया है कि यह चांदी ट्रस्ट के महासचिव Champat Rai को सौंपी गई थी, लेकिन दानदाताओं को कोई पावती नहीं दी गई।
यदि यह दावा सही साबित होता है तो यह केवल चांदी के हिसाब-किताब का मामला नहीं रहेगा, बल्कि दान प्रबंधन प्रणाली की पारदर्शिता पर भी गंभीर सवाल खड़े करेगा। आलोचकों का कहना है कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े संस्थान में हर दान का स्पष्ट रिकॉर्ड होना चाहिए, जबकि समर्थकों का तर्क है कि जांच पूरी होने से पहले किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।
फिलहाल अयोध्या में एक साथ कई मुद्दे चर्चा के केंद्र में हैं वॉटर मेट्रो की उपयोगिता, चढ़ावे की गणना व्यवस्था, कथित वित्तीय अनियमितताओं की जांच, भूमि खरीद के पुराने विवाद और अब चांदी दान का नया दावा। इन सभी सवालों का जवाब आने वाले दिनों में जांच रिपोर्ट और आधिकारिक तथ्यों के सामने आने के बाद ही मिल सकेगा। लेकिन इतना तय है कि अयोध्या से जुड़े ये घटनाक्रम धार्मिक, प्रशासनिक और राजनीतिक तीनों स्तरों पर बड़ी बहस का विषय बन चुके हैं।
written by:- Anjali Mishra
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