उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों सबसे बड़ी चर्चा योगी सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार के बाद शुरू हुई उस खामोशी की है, जिसने सत्ता के गलियारों में कई सवाल खड़े कर दिए हैं। मंत्रिमंडल विस्तार हुए एक हफ्ते से ज्यादा समय बीत चुका है, लेकिन नए मंत्रियों को अब तक विभाग नहीं सौंपे गए हैं। आमतौर पर मंत्रिमंडल विस्तार के तुरंत बाद विभागों का बंटवारा कर दिया जाता है ताकि नए मंत्री अपने कामकाज की जिम्मेदारी संभाल सकें, लेकिन इस बार तस्वीर कुछ अलग दिखाई दे रही है। यही वजह है कि राजनीतिक हलकों में तरह-तरह की चर्चाएं तेज हो गई हैं।
सूत्रों के मुताबिक इस देरी की सबसे बड़ी वजह बड़े और प्रभावशाली मंत्रालयों को लेकर जारी मंथन बताया जा रहा है। प्रदेश सरकार में लोक निर्माण विभाग यानी PWD, ऊर्जा मंत्रालय और जनसंपर्क जैसे विभाग सिर्फ प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं बल्कि राजनीतिक और रणनीतिक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं। ऐसे मंत्रालयों का फैसला केवल प्रशासनिक संतुलन नहीं बल्कि राजनीतिक समीकरणों को ध्यान में रखकर किया जाता है। यही कारण है कि विभागों के बंटवारे पर अंतिम सहमति बनना अभी बाकी बताया जा रहा है।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि उत्तर प्रदेश जैसा बड़ा राज्य केवल विकास योजनाओं के आधार पर नहीं बल्कि सामाजिक, क्षेत्रीय और संगठनात्मक संतुलन को ध्यान में रखकर चलाया जाता है। मंत्रिमंडल विस्तार के बाद यह भी देखा जाता है कि किस क्षेत्र, जातीय समीकरण और संगठन से जुड़े नेताओं को कितना प्रतिनिधित्व मिला है। ऐसे में विभागों का आवंटन भी एक तरह से राजनीतिक संदेश देने का काम करता है। इसलिए फैसला जितना आसान बाहर से दिखता है, अंदर से उतना ही जटिल माना जा रहा है।
इसी बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की केंद्रीय नेतृत्व से मुलाकात ने चर्चाओं को और तेज कर दिया है। बताया जा रहा है कि मुख्यमंत्री ने इस मसले को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा से भी मुलाकात की। इन बैठकों को सामान्य शिष्टाचार मुलाकात नहीं बल्कि महत्वपूर्ण राजनीतिक चर्चा के रूप में देखा जा रहा है। क्योंकि उत्तर प्रदेश भाजपा के लिए सिर्फ एक राज्य नहीं बल्कि राष्ट्रीय राजनीति की धुरी माना जाता है, इसलिए यहां लिए गए फैसलों का असर दूर तक दिखाई देता है।
राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि भाजपा नेतृत्व आगामी चुनावी रणनीति को ध्यान में रखते हुए बेहद सावधानी से आगे बढ़ना चाहता है। उत्तर प्रदेश में हर बड़ा फैसला केवल वर्तमान को नहीं बल्कि भविष्य की राजनीति को ध्यान में रखकर लिया जाता है। ऐसे में यह संभव माना जा रहा है कि विभागों के बंटवारे में क्षेत्रीय समीकरण, संगठन की पसंद और आगामी चुनावों की रणनीति सब कुछ एक साथ जोड़ा जा रहा हो।
विपक्ष भी इस देरी को लेकर सरकार पर सवाल उठाने लगा है। विपक्षी दलों का कहना है कि यदि सरकार के भीतर सब कुछ सामान्य है तो फिर विभागों के बंटवारे में इतनी देर क्यों हो रही है। विपक्ष इसे सरकार के अंदर खींचतान और असहमति से जोड़कर देख रहा है। हालांकि सत्ता पक्ष की ओर से अब तक इसे लेकर कोई स्पष्ट बयान सामने नहीं आया है, लेकिन देरी जितनी बढ़ रही है, सवाल भी उतने ही बड़े होते जा रहे हैं।
दूसरी तरफ नए मंत्री भी फिलहाल इंतजार की स्थिति में हैं। शपथ लेने के बाद किसी भी मंत्री की असली जिम्मेदारी तब शुरू होती है जब उसे विभाग मिल जाए। विभाग तय होने के बाद ही मंत्री अपनी प्राथमिकताएं तय करते हैं और प्रशासनिक बैठकों का सिलसिला शुरू होता है। ऐसे में विभागों की घोषणा में हो रही देरी प्रशासनिक स्तर पर भी उत्सुकता पैदा कर रही है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर यह इंतजार कब खत्म होगा। क्या अगले कुछ दिनों में विभागों की सूची सामने आएगी या फिर यह राजनीतिक मंथन और लंबा खिंचेगा? प्रदेश की नौकरशाही से लेकर भाजपा संगठन और राजनीतिक विश्लेषकों तक, हर किसी की नजर अब सिर्फ एक फैसले पर टिकी हुई है। क्योंकि यह केवल विभागों का बंटवारा नहीं बल्कि सत्ता और रणनीति के उस समीकरण की कहानी है, जो उत्तर प्रदेश की राजनीति की अगली दिशा तय कर सकता है।
फिलहाल उत्तर प्रदेश की सत्ता में सब कुछ शांत जरूर दिखाई दे रहा है, लेकिन अंदरखाने राजनीतिक हलचल तेज बताई जा रही है। अब देखना दिलचस्प होगा कि योगी सरकार की इस ‘विभागीय पहेली’ का हल कब निकलता है और कौन नेता किस मंत्रालय का जिम्मा संभालता है। क्योंकि कभी-कभी राजनीति में असली खबर शपथ ग्रहण नहीं, बल्कि उसके बाद होने वाला विभागों का बंटवारा बन जाता है।
written by:- Anjali Mishra
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