उत्तराखंड के रामनगर स्थित घने जंगलों से एक ऐसी खबर सामने आई जिसने वन्यजीव प्रेमियों के साथ-साथ आम लोगों की भी उत्सुकता बढ़ा दी। कोसी रेंज के टेड़ा गांव में एक बेहद दुर्लभ और विशालकाय गिलहरी दिखाई दी, जिसे देखकर ग्रामीण पहले तो हैरान रह गए। उसका आकार सामान्य गिलहरियों से काफी बड़ा था और उसकी बनावट भी बिल्कुल अलग नजर आ रही थी। लोगों को समझ नहीं आया कि यह कौन-सा जीव है, इसलिए उन्होंने तुरंत इसकी सूचना वन विभाग को दी। सूचना मिलते ही रेस्क्यू टीम मौके पर पहुंची और बेहद सावधानी के साथ इस दुर्लभ जीव को सुरक्षित अपने कब्जे में लिया। जांच के बाद पुष्टि हुई कि यह इंडियन जायंट फ्लाइंग स्क्विरल है, जो भारत में बेहद कम दिखाई देने वाली प्रजातियों में शामिल है।
इस दुर्लभ गिलहरी का दोबारा दिखाई देना इसलिए भी खास माना जा रहा है क्योंकि रामनगर क्षेत्र में इसे करीब 12 साल बाद देखा गया है। इतने लंबे अंतराल के बाद इस प्रजाति की मौजूदगी यह संकेत देती है कि जंगल का कुछ हिस्सा अब भी इतना सुरक्षित है कि वहां दुर्लभ वन्यजीव अपना जीवन चक्र जारी रख सकें। वन विभाग के अधिकारियों का मानना है कि इस तरह की प्रजातियों का दिखना किसी भी जंगल की जैव विविधता और पर्यावरणीय संतुलन का सकारात्मक संकेत हो सकता है। हालांकि इसका गांव तक पहुंच जाना इस बात का भी इशारा करता है कि कहीं न कहीं उसके प्राकृतिक आवास में बदलाव आया है या वह भोजन और सुरक्षित स्थान की तलाश में आबादी वाले इलाके तक पहुंच गई।
‘फ्लाइंग स्क्विरल’ नाम सुनकर अक्सर लोगों को लगता है कि यह गिलहरी पक्षियों की तरह आसमान में उड़ती होगी, लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है। यह गिलहरी अपने आप पंख फड़फड़ाकर उड़ नहीं सकती। इसके अगले और पिछले पैरों के बीच एक पतली त्वचा की झिल्ली होती है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में पैटाजियम (Patagium) कहा जाता है। जब यह किसी ऊंचे पेड़ से छलांग लगाती है, तो यही झिल्ली पैराशूट की तरह फैल जाती है और उसे हवा में संतुलित रखते हुए एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक फिसलने यानी ग्लाइड करने में मदद करती है। यही कारण है कि इसे ‘फ्लाइंग’ स्क्विरल कहा जाता है, जबकि वास्तव में यह नियंत्रित तरीके से हवा में तैरती है।
विशेषज्ञों के अनुसार इंडियन जायंट फ्लाइंग स्क्विरल एक बार में लगभग 50 से 60 मीटर तक ग्लाइड कर सकती है। यह क्षमता इसे जंगल के भीतर बिना जमीन पर उतरे एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक पहुंचने में मदद करती है। इससे यह अपने शिकारी जानवरों से भी बच जाती है और भोजन की तलाश में तेजी से आगे बढ़ सकती है। इसकी बड़ी-बड़ी आंखें, घनी पूंछ और मुलायम फर इसे रात के अंधेरे में भी आसानी से देखने और संतुलन बनाए रखने में मदद करते हैं। यही विशेषताएं इसे सामान्य गिलहरियों से पूरी तरह अलग बनाती हैं।
यह प्रजाति मुख्य रूप से रात्रिचर यानी निशाचर होती है। दिन के समय यह पेड़ों की ऊंची शाखाओं या प्राकृतिक खोखलों में आराम करती है और सूर्यास्त के बाद भोजन की तलाश में निकलती है। इसका भोजन मुख्य रूप से फल, बीज, पत्तियां, फूल, कोमल टहनियां और कभी-कभी पेड़ों की छाल होता है। चूंकि यह ज्यादातर समय पेड़ों पर ही बिताती है, इसलिए आम लोगों की नजरों में बहुत कम आती है। यही वजह है कि जब भी यह किसी आबादी वाले क्षेत्र में दिखाई देती है तो लोगों के बीच कौतूहल का विषय बन जाती है।
वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी दुर्लभ जीव का जंगल छोड़कर गांव तक पहुंचना कई कारणों से हो सकता है। कभी भोजन की कमी, कभी प्राकृतिक आवास में बदलाव, तो कभी जंगलों के सिकुड़ने की वजह से ऐसे जीव भटककर मानव बस्तियों तक पहुंच जाते हैं। बढ़ती आबादी, सड़क निर्माण, जंगलों की कटाई और मानवीय हस्तक्षेप के कारण वन्यजीवों के प्राकृतिक रास्ते लगातार प्रभावित हो रहे हैं। ऐसे में कई बार दुर्लभ प्रजातियां सुरक्षित रास्ता खोजते-खोजते गांवों में पहुंच जाती हैं।
रामनगर और उसके आसपास का इलाका जैव विविधता के लिहाज से बेहद समृद्ध माना जाता है। यहां के घने जंगलों में बाघ, तेंदुआ, हाथी, हिरण, भालू, कई दुर्लभ पक्षी और अनेक छोटे स्तनधारी जीव पाए जाते हैं। इंडियन जायंट फ्लाइंग स्क्विरल का दोबारा दिखाई देना इस बात का संकेत है कि इस क्षेत्र का पारिस्थितिक तंत्र अभी भी कई अनमोल प्रजातियों का घर बना हुआ है। हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि इन जीवों की सुरक्षा के लिए जंगलों का संरक्षण और मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करना बेहद जरूरी है।
वन विभाग की रेस्क्यू टीम ने इस दुर्लभ गिलहरी को सुरक्षित पकड़ने के बाद उसकी स्वास्थ्य जांच कराई और यह सुनिश्चित किया कि उसे किसी तरह की चोट न हो। इसके बाद उसे उसके प्राकृतिक आवास में सुरक्षित छोड़ने की प्रक्रिया पूरी की गई, ताकि वह फिर से जंगल के अपने वातावरण में सामान्य जीवन जी सके। वन अधिकारियों ने ग्रामीणों की भी सराहना की कि उन्होंने घबराकर उसे नुकसान पहुंचाने की बजाय तुरंत वन विभाग को सूचना दी। इस तरह की जागरूकता ही दुर्लभ वन्यजीवों के संरक्षण में सबसे बड़ी भूमिका निभाती है।
इंडियन जायंट फ्लाइंग स्क्विरल का 12 साल बाद दोबारा दिखना केवल एक वन्यजीव समाचार नहीं है, बल्कि यह हमें प्रकृति के अनमोल खजाने की याद भी दिलाता है। यह घटना बताती है कि हमारे जंगल आज भी ऐसे अद्भुत जीवों का घर हैं, जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। यदि हम जंगलों को सुरक्षित रखेंगे, वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास का सम्मान करेंगे और पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देंगे, तभी आने वाली पीढ़ियां भी इन दुर्लभ जीवों को किताबों या तस्वीरों में नहीं, बल्कि जीवित रूप में हमारे जंगलों में देख पाएंगी।
written by :- Anjali Mishra
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