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वंदे मातरम् पर नया संग्राम! देशभक्ति या राजनीति भारत फिर ठहरा एक दोराहे पर

भारत में एक बार फिर यह बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि क्या देश में रहने के लिए “वंदे मातरम्” कहना अनिवार्य होना चाहिए? देशभक्ति और पहचान की बहस के बीच यह मुद्दा वर्षों से राजनीतिक और सामाजिक विवादों का केंद्र बना रहा है। पहले कई बीजेपी नेताओं के बयान आए कि भारत में रहने वालों को वंदे मातरम् कहना चाहिए, और इसे राष्ट्रभक्ति की कसौटी बताया गया। लेकिन अब उसी दौर में, मोदी सरकार की ओर से संसद में “वंदे मातरम्” और “जय हिंद” जैसे नारे लगाने पर रोक लगा दी गई है, ताकि सदन का “शिष्टाचार और मर्यादा” बना रहे। इस फैसले ने नया तूफान खड़ा कर दिया, और लोग पूछने लगे कि क्या पहले सदन बिना मर्यादा के चल रहा था, और क्या राष्ट्रवादी नारों की जगह राजनीतिक शोर-शराबे ने ले ली है?

इसी बहस के बीच एक और विवादास्पद बयान ने माहौल और गरमा दिया। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के नेता मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि “वंदे मातरम् का पाठ ‘मुर्दा कौम’ की पहचान है।” यह बयान सामने आते ही सभी तरफ से तीखी प्रतिक्रियाएं शुरू हो गईं। बीजेपी के वरिष्ठ नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने इसे “नफरत और नासमझी से भरा” बताया, जबकि विपक्ष और कई विश्लेषकों ने इसे एक नई राजनीतिक रणनीति से जोड़कर देखा, खासकर पश्चिम बंगाल की राजनीति, जहां धर्म, राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक पहचान हमेशा चुनावी पिच का हिस्सा रहे हैं।

यह भी दिलचस्प है कि जिस तरह एक तरफ सरकार सदन में नारों पर रोक लगा रही है, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष और अल्पसंख्यक संगठनों की बयानबाज़ी इस फैसले को उलटे राजनीतिक अर्थ दे रही है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या सरकार अब राष्ट्रवादी नारों को नियंत्रित करना चाहती है, या फिर यह कदम सदन की छवि बचाने की कोशिश है? संसद में नारे प्रतिबंधित करने का तर्क यह दिया जा रहा है कि इससे बहस की गंभीरता खत्म होती थी, लेकिन आलोचकों का कहना है कि अगर “वंदे मातरम्” या “जय हिंद” को मर्यादा-विरोधी माना जा रहा है तो यह सोच ही राजनीतिक रूप से संदिग्ध है।

वंदे मातरम् हमेशा से भारतीय इतिहास, स्वतंत्रता आंदोलन और सांस्कृतिक एकता की पहचान रहा है। बावजूद इसके, कुछ समूह इसकी कुछ पंक्तियों को धार्मिक रूप से असहज मानते हैं, जिसके चलते यह मुद्दा समय-समय पर उभरता रहता है। महमूद मदनी का बयान इसी लंबे विवाद की नई कड़ी है, और इससे फिर वही पुराना सवाल सामने आ गया है क्या राष्ट्रभक्ति किसी एक विचारधारा से बंधी होती है, या यह हर नागरिक की व्यक्तिगत और स्वतंत्र भावना है?

आज जब राजनीतिक दल चुनावी माहौल में अपनी-अपनी बयानबाज़ी तेज कर रहे हैं, तो वंदे मातरम् जैसे प्रतीक फिर से बहस के केंद्र में आ गए हैं। कुछ इसे देशभक्ति की असल कसौटी मानते हैं, जबकि कुछ इसे राजनीतिक हथियार बताया जा रहा है, जिसे चुनावी फायदे के लिए इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे में यह सवाल और भी गहरा हो जाता है कि क्या यह मामला वाकई राष्ट्रभक्ति का है, या फिर धर्म और राजनीति की पहचान की लड़ाई बन चुका है?

आखिरकार देश एक बार फिर एक जटिल बहस के बीच खड़ा है जहां राष्ट्रभक्ति की परिभाषा तय करने की कोशिशें जारी हैं, और हर पक्ष अपने-अपने तरीके से इसे लोगों की भावनाओं से जोड़ने में लगा है। असली चुनौती अब यही है कि क्या देश ऐसे प्रतीकों को जोड़ने वाली शक्ति के रूप में देखेगा या इन्हें विभाजनकारी बहसों में बदलने देगा?

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