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उत्तर प्रदेश ब्रिज कॉरपोरेशन में भ्रष्टाचार का पुल ,यूपी ब्रिज कॉर्पोरशन ,डेपुटेशन पर

लखनऊ: उत्तर प्रदेश राज्य सेतु निगम, जिसके कंधों पर समूचे प्रदेश में पुल निर्माण की जिम्मेदारी है, भ्रष्टाचार और मनमानी के दलदल में फंसता नजर आ रहा है। सूत्रों के हवाले से खुलासा हुआ है कि योगी सरकार द्वारा आवंटित भारी-भरकम बजट के बावजूद, निगम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। निगम ने सैकड़ों पुलों को पूरा करने का दावा किया है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है।सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि सैकड़ों करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट्स संभालने वाले इस निगम के पास अपने जूनियर इंजीनियर (जेई) तक नहीं हैं। सूत्रों के अनुसार, जेई की कमी को पूरा करने के लिए पीडब्ल्यूडी विभाग से डेपुटेशन पर इंजीनियर मंगवाए गए हैं। भर्तियों पर ताला लगा हुआ है, जबकि फंड की कोई कमी नहीं। यह सवाल उठता है कि इतने बड़े संस्थान में भर्तियों को क्यों रोका गया? क्या यह सब कुछ खास लोगों को फायदा पहुंचाने की साजिश का हिस्सा है? अनुभवहीन फर्मों को ठेके, गुणवत्ता पर सवाल सूत्रों का दावा है कि निगम में फंड का बंदरबांट और अनियमितताओं का खेल खुलेआम चल रहा है। कुछ साल पहले तक नाले-नालियों का काम करने वाली फर्मों को अब सैकड़ों करोड़ के पुल निर्माण के ठेके दे दिए गए हैं। इन फर्मों के पास बड़े पैमाने पर पुल निर्माण का अनुभव नहीं है, फिर भी इन्हें बड़े प्रोजेक्ट्स सौंपे जा रहे हैं। इसका नतीजा गोलाघाट पुल जैसे घटिया निर्माण के रूप में सामने आ रहा है, जो न केवल जनता की सुरक्षा के लिए खतरा है, बल्कि सरकारी धन के दुरुपयोग का भी सबूत है।आला अधिकारियों पर मलाई काटने का आरोपसूत्रों ने बताया कि कुछ आला अधिकारी खास फर्मों को ठेके देकर मोटी कमाई कर रहे हैं। आरोप है कि इन अधिकारियों की मिलीभगत से अनुभवहीन फर्मों को प्रोजेक्ट्स दिए जा रहे हैं, जिससे गुणवत्ता से समझौता हो रहा है। गोलाघाट पुल की घटना ने निगम की कार्यशैली पर सवालिया निशान लगा दिया है। क्या यह सब कुछ सुनियोजित तरीके से हो रहा है? क्या आला अधिकारी अपनी जेबें भरने के लिए जनता की जान और सरकारी धन से खिलवाड़ कर रहे हैं?सरकार की चुप्पी, जनता के सवालसेतु निगम की इस बदहाली और मनमानी के लिए आखिर जिम्मेदार कौन है? सूत्रों का कहना है कि निगम में भ्रष्टाचार की गंगा बह रही है, लेकिन सरकार और जांच एजेंसियां खामोश हैं। जनता यह जानना चाहती है कि आखिर कब तक इस तरह की मनमानी चलती रहेगी? कब तक अनुभवहीन फर्मों के हवाले कीमती पुलों का निर्माण कराया जाता रहेगा?इस मामले में निगम के अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। अब सवाल यह है कि क्या सरकार इस भ्रष्टाचार के पुल को ढहाने के लिए कोई कदम उठाएगी, या यह सिलसिला यूं ही चलता रहेगा?(यह खबर सूत्रों के हवाले से है। जांच और कार्रवाई की मांग तेज हो रही है।

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