पश्चिमी महाराष्ट्र के गन्ना बेल्ट में एक ऐसा फैसला लिया गया है, जो भारत में मानव–वन्यजीव संघर्ष प्रबंधन का नया अध्याय लिख सकता है। जुन्नार वन विभाग पहली बार आज़ाद घूमने वाले तेंदुओं की नसबंदी का ट्रायल शुरू करने जा रहा है एक ऐसा प्रयोग जो अब तक सिर्फ कुत्तों या पालतू जानवरों तक सीमित था, लेकिन अब इसे पहली बार जंगली बड़े मांसाहारी प्रजातियों पर लागू किया जा रहा है। यह कदम तकरीबन इस सोच पर आधारित है कि सिर्फ पकड़कर जंगल में छोड़ देना या दूसरी जगह शिफ्ट करना अब कारगर नहीं, बल्कि समस्या की जड़ यानी तेज़ी से बढ़ती आबादी को नियंत्रित करना ही असली समाधान है।
पिछले कुछ वर्षों में महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में तेंदुओं की आवाजाही में खतरनाक बढ़ोतरी हुई है। गन्ने के खेतों को वे सुरक्षित ठिकाना समझकर वहीं बच्चों को जन्म देते हैं, वहीं घूमते हैं, और इसी दौरान पालतू पशुओं एवं इंसानों के साथ संघर्ष की घटनाएँ बढ़ जाती हैं। पालतू जानवरों पर हमले, खेतों में अचानक आमना-सामना, और कुछ जगहों पर जानलेवा घटनाओं ने ग्रामीणों की चिंता को चरम पर पहुँचा दिया है। ऐसे में तेंदुओं की बढ़ती संख्या को रोकने का यह तरीका कई विशेषज्ञों को व्यावहारिक और भविष्यवादी लग रहा है।
जुन्नार को लंबे समय तक मानव–तेंदुआ सह-अस्तित्व मॉडल माना जाता था। यहाँ के लोग तेंदुओं के साथ रहना सीख चुके थे, और तेंदुए भी इंसानी आबादी के बीच बिना बड़े संघर्ष के गुजर-बसर करते थे। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में हालात तेजी से बदले हैं। हमलों में वृद्धि, तेंदुओं की बढ़ती निर्भीकता और ग्रामीण इलाकों में उनकी लगातार मौजूदगी ने इस मॉडल में बड़ी दरारें पैदा कर दी हैं। यही वजह है कि वन विभाग अब पहले से कहीं अधिक सक्रिय और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने को मजबूर हुआ है।
नसबंदी का यह प्रयोग बेहद सावधानी से किया जाएगा तेंदुए को बेहोश करके सर्जिकल प्रक्रिया अपनाई जाएगी, ताकि उसे फिर से उसी क्षेत्र में छोड़ा जा सके जहाँ वह पहले रहता था। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह ट्रायल सफल रहा, तो यह तकनीक भारत के उन क्षेत्रों में भी लागू की जा सकती है जहाँ मानव वन्यजीव संघर्ष चरम पर है, जैसे हिमाचल, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश और राजस्थान। इससे न सिर्फ इंसानों की सुरक्षा बढ़ेगी, बल्कि तेंदुओं की भी जान बचेगी, क्योंकि संघर्ष बढ़ने पर अक्सर वन्यजीवों को मारने या पकड़ने की नौबत आती है।
यह पहल एक बड़ी सोच को सामने लाती है कि वन्यजीव संरक्षण अब सिर्फ जंगलों की सीमाओं में सीमित नहीं रह सकता। जब इंसान और तेंदुआ दोनों एक ही भू-भाग साझा कर रहे हों, तो संघर्ष से ज्यादा जरूरी है समन्वय और नियंत्रण। नसबंदी जैसे वैज्ञानिक उपाय यह साबित करते हैं कि समस्या को खत्म करने का मतलब कभी भी किसी प्रजाति को खत्म करना नहीं होता, बल्कि संतुलन बनाना होता है।
आखिरकार, यह प्रयोग सिर्फ तेंदुओं पर नहीं, बल्कि उस भविष्य पर भी है जिसमें इंसान और जंगल दोनों पा सकें एक सुरक्षित गुंजाइश। यह पहल यह उम्मीद जगाती है कि अगर विज्ञान और संवेदनशीलता साथ आएँ, तो पहाड़ जैसा संघर्ष भी हल्का हो सकता है।
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