पांच साल पहले देश ने एक ऐसा बड़ा आंदोलन देखा था, जिसने केंद्र सरकार को अपने फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया था। किसान आंदोलन के लंबे और व्यापक दबाव के बाद तीन कृषि कानून वापस लेने पड़े थे। अब एक बार फिर जंतर-मंतर से उठी छात्रों और युवाओं की आवाज ने देश की राजनीति में बहस को तेज कर दिया है। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को इसी जनदबाव की राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत में लंबे समय तक चलने वाला और संगठित जनदबाव अब भी सरकारों के फैसलों को बदलने की ताकत रखता है?
किसान आंदोलन और छात्र आंदोलन के मुद्दे भले ही अलग हों, लेकिन दोनों के बीच एक समानता जरूर दिखाई देती है—लगातार विरोध और सरकार से जवाबदेही की मांग। किसान आंदोलन में कृषि कानूनों को लेकर सवाल उठे थे, जबकि जंतर-मंतर पर छात्रों और युवाओं की आवाज शिक्षा व्यवस्था, परीक्षाओं, कथित अनियमितताओं और भविष्य की चिंताओं से जुड़ी हुई है। यही वजह है कि अब यह बहस केवल एक मंत्रालय या एक फैसले तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि इसे देश के युवाओं के व्यापक असंतोष से जोड़कर भी देखा जा रहा है।
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को लेकर राजनीतिक बहस भी इसी वजह से महत्वपूर्ण हो गई है। अगर किसी मंत्री को किसी बड़े विवाद या लगातार बढ़ते जनदबाव के बीच पद छोड़ना पड़ता है, तो यह सवाल उठता है कि क्या भारतीय राजनीति में जवाबदेही की परंपरा फिर से मजबूत हो रही है? क्या अब जनता के दबाव के सामने सरकारों और मंत्रियों को अपने फैसलों का जवाब देना होगा? या फिर यह केवल एक राजनीतिक परिस्थिति का परिणाम है, जिसका असर कुछ समय बाद खत्म हो जाएगा?
यहां सबसे बड़ा सवाल सिर्फ शिक्षा का नहीं है। देश का युवा जब अपने भविष्य को लेकर चिंतित होता है, तो उसके सवाल रोजगार, बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं, पेपर लीक, महंगाई और अवसरों की कमी तक पहुंचते हैं। ऐसे में जंतर-मंतर का छात्र आंदोलन क्या केवल एक तत्काल मुद्दे का विरोध है, या फिर यह युवाओं के भीतर जमा हो रहे व्यापक असंतोष का संकेत है? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत की राजनीति में युवा मतदाता लगातार एक बड़ी भूमिका निभा रहा है।
दूसरी तरफ किसानों का मुद्दा भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। कृषि कानूनों की वापसी के बाद भी किसानों से जुड़े कई सवाल समय-समय पर राजनीतिक बहस का हिस्सा बनते रहे हैं। किसान आंदोलन ने यह दिखाया था कि जब कोई आंदोलन लंबे समय तक संगठित तरीके से चलता है और उसे व्यापक जनसमर्थन मिलता है, तो उसका राजनीतिक प्रभाव काफी दूर तक जा सकता है। अब छात्र आंदोलन को लेकर भी यही सवाल उठ रहा है कि क्या यह आंदोलन आने वाले समय में शिक्षा से आगे बढ़कर युवाओं और रोजगार के बड़े मुद्दों का चेहरा बन सकता है?
अगर ऐसा होता है, तो इसका असर सिर्फ सरकार पर नहीं बल्कि विपक्षी राजनीति पर भी पड़ेगा। विपक्ष के सामने यह चुनौती होगी कि वह युवाओं के सवालों को कितनी मजबूती से उठाता है और उन्हें केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रखता है या फिर उनके लिए ठोस एजेंडा भी तैयार करता है। वहीं सरकार के सामने चुनौती यह होगी कि वह आंदोलनों को केवल कानून-व्यवस्था के नजरिए से देखती है या बातचीत और समाधान का रास्ता भी अपनाती है।
किसान आंदोलन के बाद कृषि कानूनों की वापसी और अब छात्र आंदोलन के बीच धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की चर्चा ने भारतीय राजनीति में एक बड़ी बहस को जन्म दे दिया है। सवाल यह है कि क्या यह घटनाक्रम आने वाले समय में जवाबदेही की राजनीति को नई दिशा देगा? क्या मंत्री और सरकारें अब जनता के सवालों का जवाब देने के लिए ज्यादा दबाव महसूस करेंगी? और क्या किसी आंदोलन की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह कितने लंबे समय तक चलता है, कितना संगठित है और उसे कितना जनसमर्थन हासिल होता है?
आने वाले दिनों में इन सवालों के जवाब बेहद महत्वपूर्ण होंगे। अगर छात्र आंदोलन अपने मुद्दों को व्यापक युवा असंतोष से जोड़ने में सफल रहता है, तो इसका असर राजनीति पर दिखाई दे सकता है। बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा और किसानों के सवाल अगर एक बड़े जनविमर्श का हिस्सा बनते हैं, तो 2027 समेत आने वाले चुनावों की राजनीति में भी इनका प्रभाव देखने को मिल सकता है। ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि एक मंत्री का इस्तीफा हुआ या नहीं, बल्कि असली सवाल यह है कि क्या भारत की राजनीति में जनदबाव एक बार फिर सरकारों के फैसलों को प्रभावित करने की ताकत बन रहा है?
written by:- Anjali Mishra
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