मध्य प्रदेश के छतरपुर और पन्ना जिले में केन-बेतवा लिंक परियोजना को लेकर विरोध अब तेज होता जा रहा है। आदिवासी समुदाय के लोग अपनी मांगों को लेकर अनोखे तरीके से प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रदर्शनकारी “चिता आंदोलन” के तहत प्रतीकात्मक रूप से चिता पर लेटकर और बैठकर सरकार तक अपनी आवाज पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यह आंदोलन सिर्फ जमीन बचाने की लड़ाई नहीं है, बल्कि उनके घर, संस्कृति, परंपराओं और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को बचाने की कोशिश है। उनका कहना है कि अगर विकास के नाम पर उनसे सब कुछ छीन लिया गया, तो उनके लिए ऐसी जिंदगी जीना मौत से भी ज्यादा मुश्किल होगी।
इसी दर्द को जाहिर करते हुए कई लोगों ने चिता पर बैठकर “इंसाफ दो, वरना जान से मार दो” जैसे नारे लगाए। उनका कहना है कि वह अपनी जमीन और अधिकारों के लिए आखिरी दम तक संघर्ष करेंगे और बिना उचित समाधान के अपना स्थान छोड़ने को तैयार नहीं हैं।
बताया जा रहा है कि केन-बेतवा लिंक परियोजना के तहत बनने वाले दौधन बांध से कई गांव प्रभावित हो सकते हैं। प्रदर्शनकारियों का दावा है कि करीब 22 गांवों पर इसका असर पड़ेगा और हजारों परिवारों के विस्थापित होने की आशंका है।
आदिवासी समुदाय की सबसे बड़ी चिंता पुनर्वास और आजीविका को लेकर है। उनका कहना है कि सिर्फ जमीन का मुआवजा देना काफी नहीं है, क्योंकि उनके लिए जंगल, जमीन और स्थानीय संस्कृति ही उनकी पहचान और जीवन का आधार है।
वहीं परियोजना समर्थकों का कहना है कि केन-बेतवा लिंक परियोजना से क्षेत्र में पानी की समस्या दूर करने, सिंचाई बढ़ाने और विकास को गति देने में मदद मिलेगी। सरकार की ओर से भी परियोजना को महत्वपूर्ण बताया जाता रहा है।
लेकिन दूसरी तरफ प्रभावित इलाकों के लोग अपनी मांगों पर अड़े हुए हैं। उनका कहना है कि विकास ऐसा होना चाहिए जिसमें स्थानीय लोगों के अधिकार और जीवन सुरक्षित रहें।
फिलहाल केन-बेतवा लिंक परियोजना को लेकर विकास और विस्थापन की बहस लगातार जारी है। एक तरफ सरकार इसे क्षेत्र के लिए बड़ी योजना बता रही है, वहीं दूसरी तरफ आदिवासी समुदाय अपने अस्तित्व और अधिकारों की लड़ाई लड़ रहा है।
written by:- Anjali Mishra
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