करीब तीन महीनों से पश्चिम एशिया में तनाव, सैन्य गतिविधियों और कूटनीतिक बयानबाजी के बीच चल रही खींचतान के बाद अब अमेरिका और ईरान के रिश्तों को लेकर एक बड़ी खबर सामने आ रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक दोनों देशों के बीच लंबे समय से चल रही बातचीत अब ऐसे मोड़ पर पहुंचती दिखाई दे रही है, जहां किसी प्रारंभिक समझौते की संभावना जताई जा रही है। हालांकि अभी अंतिम और औपचारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन जिस तरह दोनों पक्षों के प्रतिनिधि लगातार वार्ता कर रहे हैं और मध्यस्थ देशों की भूमिका सक्रिय बनी हुई है, उससे संकेत मिल रहे हैं कि तनाव कम करने की दिशा में कुछ महत्वपूर्ण प्रगति हुई है।
इस पूरे घटनाक्रम की जड़ में ईरान का परमाणु कार्यक्रम है, जो कई वर्षों से अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ उसके मतभेदों का सबसे बड़ा कारण रहा है। अमेरिका चाहता है कि ईरान यूरेनियम संवर्धन पर सख्त सीमाएं स्वीकार करे और अपने परमाणु कार्यक्रम को अंतरराष्ट्रीय निगरानी के दायरे में रखे। दूसरी ओर ईरान लगातार यह कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और उसे अपने वैज्ञानिक तथा ऊर्जा संबंधी अधिकारों से समझौता करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। यही वजह है कि वार्ता की मेज पर दोनों देशों के बीच कई अहम मुद्दों पर अभी भी मतभेद मौजूद हैं।
बातचीत में सबसे संवेदनशील मुद्दों में से एक अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी यानी International Atomic Energy Agency की निगरानी व्यवस्था भी है। अमेरिका और उसके सहयोगी चाहते हैं कि ईरान के परमाणु ठिकानों पर पारदर्शी निरीक्षण जारी रहे, जबकि ईरान अपनी संप्रभुता और सुरक्षा चिंताओं को सामने रखकर कुछ शर्तों में बदलाव की मांग करता रहा है। इसी वजह से वार्ता कई बार आगे बढ़ने के बाद फिर रुकती रही, लेकिन इस बार दोनों पक्षों के रुख में अपेक्षाकृत नरमी देखने को मिल रही है।
रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया जा रहा है कि इस पूरे संवाद में केवल अमेरिका और ईरान ही शामिल नहीं रहे, बल्कि कुछ मध्यस्थ देशों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। चर्चाओं में पाकिस्तान का नाम भी सामने आया है, जिसके बारे में कहा जा रहा है कि उसने दोनों पक्षों के बीच संवाद बनाए रखने और तनाव कम करने में सहयोग किया। हालांकि इस भूमिका को लेकर अलग-अलग रिपोर्ट्स सामने आ रही हैं, लेकिन इतना स्पष्ट है कि क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई देशों ने इस वार्ता को सफल बनाने में रुचि दिखाई है।
इस संभावित समझौते का सबसे बड़ा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। दुनिया लंबे समय से पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव को लेकर चिंतित रही है, क्योंकि यह क्षेत्र वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का केंद्र माना जाता है। जैसे ही समझौते की खबरें सामने आईं, अंतरराष्ट्रीय तेल बाजारों में प्रतिक्रिया दिखाई देने लगी। तेल की कीमतों में नरमी दर्ज की गई और निवेशकों ने इसे वैश्विक स्थिरता की दिशा में सकारात्मक संकेत के रूप में देखा। शेयर बाजारों में भी उत्साह देखने को मिला, क्योंकि निवेशकों को उम्मीद है कि बड़े सैन्य संघर्ष का खतरा कम हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच कोई व्यापक समझौता होता है तो उसका सबसे बड़ा लाभ स्ट्रेट ऑफ होर्मुज क्षेत्र को मिलेगा। Strait of Hormuz दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री ऊर्जा मार्गों में से एक है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। पिछले महीनों में यहां बढ़े तनाव ने दुनिया भर के बाजारों को चिंतित कर दिया था। अब यदि समझौता होता है तो इस मार्ग की सुरक्षा को लेकर भरोसा बढ़ सकता है और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को राहत मिल सकती है।
हालांकि तस्वीर अभी पूरी तरह साफ नहीं है। अमेरिका कुछ आर्थिक प्रतिबंधों में राहत देने पर विचार कर सकता है, लेकिन ईरान की मांग इससे कहीं आगे है। तेहरान चाहता है कि उस पर लगाए गए सभी प्रमुख प्रतिबंध पूरी तरह समाप्त किए जाएं ताकि उसकी अर्थव्यवस्था को राहत मिल सके। यही वह मुद्दा है जहां दोनों पक्षों के बीच सबसे बड़ी दूरी बनी हुई है। अमेरिका चरणबद्ध राहत की बात कर रहा है, जबकि ईरान व्यापक और ठोस प्रतिबंध हटाने की मांग पर कायम है।
इसी बीच ईरान के उप विदेश मंत्री के कथित बयान ने भी चर्चाओं को और तेज कर दिया है। रिपोर्ट्स के अनुसार उन्होंने सरकारी टेलीविजन पर वार्ता में प्रगति और संभावित समझौते की दिशा में बढ़ने की बात स्वीकार की है। यदि आने वाले दिनों में औपचारिक दस्तावेजों पर हस्ताक्षर होते हैं, तो यह केवल दो देशों के रिश्तों में बदलाव नहीं होगा, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया की रणनीतिक स्थिति को प्रभावित करने वाला घटनाक्रम साबित हो सकता है।
फिलहाल दुनिया की नजरें इस वार्ता पर टिकी हुई हैं। क्या अमेरिका और ईरान वर्षों पुराने अविश्वास को पीछे छोड़कर किसी नए समझौते तक पहुंच पाएंगे, या फिर आखिरी समय में कोई नया विवाद सामने आएगा यह आने वाले दिनों में साफ होगा। लेकिन इतना तय है कि यदि यह समझौता सफल होता है, तो इसका असर सिर्फ वॉशिंगटन और तेहरान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि तेल बाजार, वैश्विक अर्थव्यवस्था, खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय राजनीति तक इसकी गूंज सुनाई देगी।
written by :- Anjali Mishra
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