इच्छा मृत्यु की गुहार: मुजफ्फरनगर से उठी समाज की अनसुनी आवाज
उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने समाज और व्यवस्था दोनों को सवालों के कठघरे में खड़ा कर दिया है। गांधीनगर कॉलोनी निवासी सुमित सैनी नामक युवक ने अपनी पत्नी द्वारा की जा रही कथित प्रताड़ना से परेशान होकर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री से इच्छा मृत्यु की अनुमति मांगी है। सोमवार को जब वह जिला कलेक्ट्रेट पहुंचा, तो उसके हाथ में एक बड़ा सा बैनर था, जिस पर उसकी पीड़ा दर्ज थी। उसने अधिकारियों को एक ज्ञापन सौंपा और साफ कहा कि अगर उसे जल्द न्याय नहीं मिला, तो वह जीवन समाप्त करने को मजबूर हो जाएगा। यह एक सामान्य विरोध प्रदर्शन नहीं था — यह एक हताशा की चरम अभिव्यक्ति थी, जिसे नज़रअंदाज़ करना समाज के लिए खतरनाक संकेत हो सकता है।
पुरुषों की पीड़ा पर चुप क्यों है व्यवस्था?
भारतीय समाज में घरेलू हिंसा को अक्सर एकतरफा नजरिए से देखा जाता है, जहां पीड़िता केवल महिला मानी जाती है। लेकिन मुजफ्फरनगर का यह मामला उस धारणा को चुनौती देता है और यह पूछने पर मजबूर करता है कि क्या पुरुषों की शिकायतें गंभीरता से ली जा रही हैं? सुमित का कहना है कि वह लगातार मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक प्रताड़ना का शिकार हो रहा है, लेकिन उसे कहीं भी सुनवाई नहीं मिल रही। कानून की मौजूदगी के बावजूद अगर कोई व्यक्ति आत्महत्या की अनुमति मांग रहा है, तो यह न्यायिक तंत्र और सामाजिक संवेदना — दोनों की विफलता है। यह घटना यह भी दर्शाती है कि ‘पुरुष पीड़ा’ को समाज अब भी हास्य या भ्रम मानता है, न कि एक गंभीर मुद्दा।
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कानूनी प्रावधान और उनकी सीमाएं: पुरुषों के अधिकार कहां हैं?
भारत में महिलाओं की सुरक्षा के लिए कड़े कानून हैं — जैसे दहेज प्रताड़ना (IPC 498A), घरेलू हिंसा अधिनियम आदि। लेकिन जब यही कानून कभी-कभी बदले की भावना या गलत मंशा से इस्तेमाल होते हैं, तो पुरुषों के पास राहत का कोई मजबूत कानूनी ढांचा नहीं होता। सुमित सैनी जैसे मामलों में यह सवाल उठता है कि क्या भारत को ‘पुरुष आयोग’ या ‘पुरुष हेल्पलाइन’ जैसी संस्थाएं ज़रूरी नहीं हैं? ऐसे मामलों में कोर्ट की भूमिका भी सीमित हो जाती है, जब तक कोई कानूनी उल्लंघन सिद्ध न हो। इसलिए सुमित की अपील केवल व्यक्तिगत संकट नहीं है, बल्कि यह कानून, समाज और सरकार के प्रति अविश्वास का सूचक बन चुकी है।
समाज की जिम्मेदारी और भविष्य की चेतावनी
सुमित की याचना को एक अकेले व्यक्ति की हताशा कहकर खारिज करना आसान है, लेकिन यह घटना आने वाले समय में ऐसी कई आवाज़ों की प्रस्तावना हो सकती है। अगर पुरुषों की भावनात्मक पीड़ा, सामाजिक अपमान और न्यायिक असहायता को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो समाज में एक नया असंतुलन पैदा होगा। न्याय व्यवस्था का दायित्व है कि वह लिंग के आधार पर नहीं, बल्कि तथ्यों के आधार पर न्याय करे। वहीं समाज को भी यह समझना होगा कि पीड़ा सिर्फ महिला की नहीं होती — पीड़ा मानवीय होती है। यदि सुमित सैनी जैसे मामलों की अनदेखी की गई, तो आने वाला समय कहीं ज़्यादा खतरनाक और असंवेदनशील हो सकता है।
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