हाल ही में इज़रायली हमलों ने ईरान के साथ तनाव को बढ़ा दिया है, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाज़ार में आघात लगे हैं और कच्चे तेल की कीमतों में 7% की तीव्र वृद्धि दर्ज की गई है। जबकि ईरान की तेल उत्पादन क्षमता 3.3 मिलियन बैरल प्रतिदिन है, लेकिन मौजूदा प्रतिबंधों के चलते उसका निर्यात घटकर केवल 1.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गया है। हालाँकि सबसे बड़ी चिंता हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य के संभावित अवरोध को लेकर है, जिसके माध्यम से विश्व की लगभग एक-पाँचवीं तेल आपूर्ति पारगमन होती है। पश्चिम एशिया में बढ़ता यह संघर्ष भारत के लिये ऊर्जा सुरक्षा, मुद्रास्फीति नियंत्रण और कूटनीतिक संतुलन बनाए रखने जैसी बहुआयामी चुनौतियाँ प्रस्तुत करता है, विशेष रूप से जब भारत को इज़राइल और ईरान के साथ अपने संबंधों को संतुलित करना है और चाबहार बंदरगाह परियोजना जैसे रणनीतिक हितों की रक्षा भी सुनिश्चित करनी है।
- इज़राइल-फिलिस्तीन संघर्ष: चलता आ रहा इज़राइल-फिलिस्तीन संघर्ष क्षेत्र में अस्थिरता का एक केंद्रीय कारण बना हुआ है, जो गहरे राजनीतिक, धार्मिक और क्षेत्रीय विवादों से जुड़ा हुआ है।
- अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर युद्धविरामकी अपीलों(जिसमें हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासभा की स्थायी युद्धविराम की मांग भी शामिल है) के बावजूद, गाज़ा में इज़राइली सैन्य कार्रवाइयों ने तनाव को और अधिक बढ़ा दिया है।
- इससे व्यापक क्षेत्रीय हस्तक्षेप की स्थिति उत्पन्न हो गई है, जिसमें हिज़बुल्ला और हमास ने इज़रायल पर अपने हमलों को तेज़ कर दिया है, जिससे संकट और गहरा हो गया है।
- अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर युद्धविरामकी अपीलों(जिसमें हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासभा की स्थायी युद्धविराम की मांग भी शामिल है) के बावजूद, गाज़ा में इज़राइली सैन्य कार्रवाइयों ने तनाव को और अधिक बढ़ा दिया है।
- ईरान-इज़रायल प्रतिद्वंद्विता और प्रॉक्सी/छद्म युद्ध: विचारधारात्मक मतभेदों से प्रेरित ईरान और इज़रायल के बीच बढ़ती प्रतिद्वंद्विता ने क्षेत्रीय अस्थिरता को और गहरा किया है। हिज़बुल्ला, हमास और अन्य मिलिशिया समूहों को ईरान का समर्थन, इज़रायल की क्षेत्रीय श्रेष्ठता के लिये एक चुनौती बन गया है।
- उदाहरण के लिये, सितंबर 2024 में ईरान द्वारा इज़रायल के सैन्य अड्डे पर किया गया मिसाइल हमला (जो हिज़बुल्ला नेता की हत्या के प्रतिशोध में था) उसके बढ़ते युद्धक इरादों को दर्शाता है।
- ईरान का क्षेत्रीय प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, क्योंकि इसके सहयोगी समूह लगातार अमेरिका और इज़रायल के हितों को निशाना बना रहे हैं, जिससे लेबनान, सीरिया और यमन में तनाव लगातार बढ़ रहा है।
- सांप्रदायिक विभाजन और प्रॉक्सी/छद्म संघर्ष: धार्मिक आधार पर गहराता विभाजन पश्चिम एशिया में अस्थिरता का एक प्रमुख कारण बन गया है, जहाँ सऊदी अरब और ईरान जैसे देश क्षेत्र भर में विरोधी गुटों का समर्थन कर रहे हैं।
- यमन में ईरान द्वारा समर्थित हूती विद्रोही लगातार सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के हितों को निशाना बना रहे हैं, जबकि सऊदी अरब सीरिया और इराक में एक प्रतिद्वंद्वी गुट का समर्थन करता है।
- यमन में चल रहे युद्ध ने अब तक 2,50,000 से अधिक लोगों की जान ले ली है और यह लगातार अस्थिरता को बढ़ावा दे रहा है, जिससे पूरे खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा प्रभावित हो रही है।
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पश्चिम एशियाई संघर्ष का भारत पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
- कूटनीतिक और रणनीतिक दुविधाएँ: भारत को इस क्षेत्र में एक जटिल कूटनीतिक चुनौती का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि उसके इज़राइल और ईरान दोनों से गहरे संबंध हैं।
- एक गुटनिरपेक्ष शक्ति या बहु-गठबंधन शक्ति के रूप में भारत की स्थिति का परीक्षण इज़रायल-फिलिस्तीन मुद्दे और इज़रायल तथा ईरान के बीच बढ़ती प्रतिद्वंद्विता से होता है।
- वर्ष 2024 में तनाव बढ़ने पर, जब इज़राइल ने ईरानी ठिकानों को निशाना बनाया, भारत को दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील करनी पड़ी, जबकि उसे दोनों देशों से अपने मज़बूत संबंध भी बनाए रखने पड़े।
- भारत के रणनीतिक हित, विशेषकर चाबहार बंदरगाह परियोजना, इस अस्थिर स्थिति से सावधानीपूर्वक निपटने की मांग करते हैं।
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