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2014 में सवाल पूछने वाले मोदी, 2026 में सवालों के घेरे में? भारतीयों की मौत, अमेरिका और सरकार की चुप्पी पर उठे बड़े सवाल !

2014 से पहले जब नरेंद्र मोदी विपक्ष के सबसे मुखर नेताओं में गिने जाते थे, तब वे राष्ट्रीय सुरक्षा, आतंकवाद और विदेश नीति को लेकर तत्कालीन केंद्र सरकार पर लगातार हमलावर रहते थे। सीमा पर आतंकी घटनाएं हों, सैनिकों की शहादत हो या विदेशों में भारतीयों के साथ कोई गंभीर घटना, मोदी अक्सर सरकार से जवाब मांगते थे और कहते थे कि देश की सुरक्षा और सम्मान के मुद्दे पर किसी भी तरह की नरमी स्वीकार नहीं की जानी चाहिए। उस दौर में उनकी राजनीति का एक बड़ा आधार यही था कि सरकार हर राष्ट्रीय मुद्दे पर दृढ़ और मुखर दिखाई दे।

लेकिन अब, जब नरेंद्र मोदी स्वयं देश के प्रधानमंत्री हैं, तो विपक्ष और उनके आलोचक उन्हीं पुराने बयानों और मानकों को सामने रखकर सवाल पूछ रहे हैं। अमेरिकी कार्रवाई में भारतीय नागरिकों की मौत की खबरों के बाद यह बहस तेज हो गई है कि क्या केंद्र सरकार ने इस मामले पर उतनी ही सख्त और स्पष्ट प्रतिक्रिया दी, जितनी अपेक्षा की जा रही थी। कई लोगों का कहना है कि भारतीय नागरिकों की जान जाने जैसी घटना पर देश के सर्वोच्च नेतृत्व की सार्वजनिक संवेदना और प्रतिक्रिया अधिक दिखाई देनी चाहिए थी।

आलोचकों का तर्क है कि प्रधानमंत्री अक्सर खिलाड़ियों, कलाकारों या अन्य सार्वजनिक हस्तियों की उपलब्धियों और मुश्किलों पर सोशल मीडिया के जरिए प्रतिक्रिया देते हैं, जो एक सकारात्मक बात है। लेकिन सवाल यह उठाया जा रहा है कि जब भारतीय नागरिकों की मौत जैसी गंभीर घटनाएं सामने आती हैं, तब सार्वजनिक स्तर पर उसी तरह की संवेदना और संदेश क्यों नहीं दिखाई देते। इसी मुद्दे को लेकर सोशल मीडिया पर भी बहस छिड़ी हुई है।

विपक्ष इस पूरे मामले को सरकार की जवाबदेही से जोड़कर देख रहा है। उनका कहना है कि जब विपक्ष में रहते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति के मुद्दों पर तत्कालीन सरकार से तीखे सवाल पूछे जाते थे, तो आज उन्हीं सवालों का सामना मौजूदा सरकार को भी करना चाहिए। आलोचकों के मुताबिक लोकतंत्र में सरकारों का मूल्यांकन उनके अपने घोषित मानकों पर होना स्वाभाविक है।

बहस का दूसरा बड़ा पहलू अमेरिका और पाकिस्तान से जुड़ा हुआ है। प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी कई बार यह कहते थे कि भारत को आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अलग-थलग करने के लिए वैश्विक शक्तियों पर दबाव बनाना चाहिए। आज विपक्ष सवाल उठा रहा है कि क्या मौजूदा सरकार अमेरिका पर वैसा ही दबाव बना पा रही है जैसा कभी विपक्ष में रहते हुए अपेक्षित बताया जाता था।

सरकार के समर्थक हालांकि इस आलोचना से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि विदेश नीति केवल सार्वजनिक बयानों और सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए नहीं चलाई जाती। कई बार संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय मामलों में सरकारें पर्दे के पीछे कूटनीतिक स्तर पर बातचीत करती हैं, जिसकी जानकारी तुरंत सार्वजनिक नहीं की जाती। उनके अनुसार किसी भी सरकार की सफलता या विफलता का आकलन केवल सार्वजनिक बयानबाजी से नहीं किया जा सकता।

विशेषज्ञों का भी मानना है कि आज की वैश्विक राजनीति पहले की तुलना में कहीं अधिक जटिल हो चुकी है। भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक, आर्थिक और रक्षा संबंध काफी गहरे हो चुके हैं। ऐसे में किसी भी विवादित घटना पर सरकार को प्रतिक्रिया देते समय कई स्तरों पर संतुलन बनाना पड़ता है। यही वजह है कि कई बार सार्वजनिक रूप से दिखाई देने वाली प्रतिक्रिया और वास्तविक कूटनीतिक गतिविधियों में अंतर होता है।

इसके बावजूद राजनीतिक सवाल अपनी जगह बने हुए हैं। विपक्ष का कहना है कि भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और सम्मान से जुड़े मामलों में सरकार को अधिक स्पष्टता और पारदर्शिता दिखानी चाहिए। वहीं सरकार समर्थकों का मानना है कि राष्ट्रीय हितों से जुड़े मामलों में केवल सार्वजनिक बयान ही सब कुछ नहीं होते। यही कारण है कि यह मुद्दा अब केवल विदेश नीति का नहीं, बल्कि राजनीतिक जवाबदेही और नेतृत्व की शैली पर भी बहस का विषय बन चुका है।

फिलहाल देश की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या विपक्ष द्वारा उठाए जा रहे ये प्रश्न आने वाले समय में और तेज होंगे, या सरकार अपने कदमों और आधिकारिक प्रतिक्रियाओं के जरिए इन आलोचनाओं का जवाब देगी। लेकिन इतना तय है कि भारतीय नागरिकों की मौत और उस पर सरकार की प्रतिक्रिया को लेकर शुरू हुई यह बहस आने वाले दिनों में भी राजनीतिक चर्चा के केंद्र में बनी रह सकती है।

written by:- Anjali Mishra

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