बिहार चुनाव में करारी हार के बाद राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के भीतर हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। नतीजों के तुरंत बाद से ही पार्टी और परिवार दोनों में तनाव साफ दिखाई दे रहा है। रोहिणी आचार्य का घर छोड़ना और तेज प्रताप यादव का पहले से ही अलग राजनीतिक राह पर चल पड़ना यह सब संकेत देते हैं कि लालू परिवार के भीतर मतभेद अब खुलकर सतह पर आ गए हैं। विधानसभा में संख्या कम होने का दबाव और हार की नैतिक जिम्मेदारी ने इस स्थिति को और भी विस्फोटक बना दिया है।
ऐसे माहौल में जब RJD विधायक दल की बैठक बुलाई गई, तो कमरे की हवा भी भारी थी। सभी वरिष्ठ नेता लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी, मीसा भारती गंभीर चेहरे के साथ मौजूद थे। परिवार और पार्टी के बड़े चेहरे एक जगह बैठे थे, लेकिन बातचीत में कड़वाहट का असर साफ दिख रहा था। यह मीटिंग सिर्फ राजनीतिक रणनीति की नहीं, बल्कि परिवार को बचाने की चिंता का भी मंच बन चुकी थी।
तेजस्वी यादव जब अपने विचार रखने के लिए खड़े हुए, तो उनका चेहरा उतरा हुआ था। आवाज में थकान और भावनात्मक बोझ दोनों थे। उन्होंने कहा “मैं परिवार संभालूं या पार्टी?” यह कथन बेहद मार्मिक था और बताता था कि वे दो मोर्चों पर संघर्ष कर रहे हैं। एक तरफ पार्टी की कमान जिन्हें दी गई है, उसी पार्टी में हार का ठीकरा भी उनके सिर फोड़ा जा रहा है। दूसरी ओर परिवार, जहां से उन्हें शक्ति और पहचान दोनों मिली, वही आज उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।
मीटिंग में तेजस्वी ने यह भी संकेत दिया कि टिकट बंटवारे के दौरान उन पर एक खास शख्स को टिकट न देने का दबाव बनाया गया था। लेकिन उन्होंने दबाव मानने के बजाय सिद्धांतों पर टिके रहना चुना। यह बयान सिर्फ राजनीतिक नहीं था, बल्कि स्पष्ट संदेश था कि परिवार के भीतर भी कई लोग टिकट वितरण के फैसलों से नाखुश थे। तेजस्वी इसे अपना व्यक्तिगत बोझ मान रहे हैं, क्योंकि अब लोग गुस्सा पार्टी से ज्यादा उन्हीं पर निकाल रहे हैं।
टिकट बंटवारे को लेकर यह मतभेद लालू परिवार की एकता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। रोहिणी आचार्य का बगावती तेवर, तेज प्रताप का अलग रास्ता और मीसा भारती की भूमिका इन सबने मिलकर RJD के भीतर एक गहरी खाई बना दी है। जिस परिवार के चेहरे पर कभी अटूट एकता की छाप थी, वही आज विपरीत ध्रुवों में बंटता जा रहा है। यह टूटती एकजुटता पार्टी की राजनीति और नेतृत्व दोनों को कमजोर बना रही है।
चुनावी हार ने RJD को सिर्फ सीटों के लिहाज से नहीं, बल्कि संगठनात्मक स्तर पर भी बड़ा झटका दिया है। परिवार के भीतर की खींचतान ने तेजस्वी की नेतृत्व क्षमता पर भी सवाल खड़े किए हैं, जबकि वे बिहार में विपक्ष की सबसे बड़ी उम्मीद माने जाते थे। अब वे खुद को दो मोर्चों पर लड़ता हुआ महसूस कर रहे हैं एक तरफ पार्टी को सांभालने का दबाव, और दूसरी ओर परिवार को टूटने से रोकने की चिंता।
कुल मिलाकर, RJD आज अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। चुनावी हार ने जहां पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल गिराया है, वहीं परिवार की अंदरूनी टूट ने नेतृत्व पर संकट खड़ा कर दिया है। अगर यह मतभेद जल्द नहीं सुलझे, तो RJD के सामने आने वाले वर्षों में राजनीतिक पुनरुत्थान की राह और मुश्किल हो सकती है।
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