अमेरिका लंबे समय से यह सुनिश्चित करता आया है कि वैश्विक तेल व्यापार डॉलर में ही हो, जिसे पेट्रोडॉलर सिस्टम कहा जाता है। यही सिस्टम अमेरिकी अर्थव्यवस्था और उसकी वैश्विक ताकत की रीढ़ माना जाता है। जब कोई देश इस व्यवस्था से बाहर निकलने की कोशिश करता है, तो उसे केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और रणनीतिक दबावों का भी सामना करना पड़ता है। वेनेजुएला का मामला इसी बड़े खेल की ओर इशारा करता है।
जब वेनेजुएला ने चीन को डॉलर के बजाय युआन में तेल बेचने की दिशा में कदम बढ़ाया, तो यह फैसला वॉशिंगटन को बिल्कुल रास नहीं आया। अमेरिका के लिए यह सिर्फ एक व्यापारिक निर्णय नहीं था, बल्कि उसकी वैश्विक आर्थिक पकड़ को दी गई सीधी चुनौती थी। तेल जैसे रणनीतिक संसाधन का गैर-डॉलर मुद्रा में कारोबार, पेट्रोडॉलर सिस्टम की नींव को हिला सकता है।
इतिहास गवाह है कि इससे पहले भी जिन देशों ने डॉलर के वर्चस्व को चुनौती देने की कोशिश की, उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ी। इराक के पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने यूरो में तेल बेचने की बात की थी, और कुछ ही समय बाद इराक युद्ध की आग में झुलस गया। लीबिया के मुअम्मर गद्दाफी ने अफ्रीकी देशों के लिए गोल्ड-बैक्ड मुद्रा का सपना देखा, और उनका अंत भी पूरी दुनिया ने देखा।
अब वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की हथकड़ियों में कोर्ट पहुंचती तस्वीरें इसी पुराने पैटर्न की याद दिलाती हैं। सवाल यह नहीं है कि मादुरो की राजनीति सही है या गलत, बल्कि सवाल यह है कि क्या यह पूरा घटनाक्रम सिर्फ कानून और लोकतंत्र से जुड़ा है, या इसके पीछे वैश्विक शक्ति संतुलन की बड़ी लड़ाई छिपी है।
वेनेजुएला तेल संसाधनों से भरपूर देश है, लेकिन उसकी जनता लंबे समय से आर्थिक संकट, महंगाई और अस्थिरता से जूझ रही है। ऐसे में जब देश अपनी तेल नीति बदलने की कोशिश करता है, तो यह फैसला जनता के भविष्य से भी जुड़ जाता है। क्या वेनेजुएला की जनता यह स्वीकार करेगी कि उनके संसाधनों पर किसी विदेशी ताकत का अप्रत्यक्ष नियंत्रण बना रहे?
यह भी बड़ा सवाल है कि क्या किसी देश को यह आज़ादी होनी चाहिए कि वह अपने संसाधन किस मुद्रा में और किस देश को बेचे, या फिर वैश्विक व्यवस्था कुछ ताकतवर देशों के इशारों पर ही चलेगी। वेनेजुएला का उदाहरण बताता है कि संसाधनों की राजनीति में संप्रभुता अक्सर सबसे पहले कुचली जाती है।
चीन के साथ युआन में तेल व्यापार का कदम सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक संदेश भी था। यह संकेत था कि दुनिया धीरे-धीरे एक बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है, जहां डॉलर के अलावा दूसरी मुद्राएं भी अहम भूमिका निभा सकती हैं। लेकिन यही बदलाव मौजूदा ताकतों को सबसे ज्यादा असहज करता है।
आज वेनेजुएला एक चौराहे पर खड़ा है, जहां एक तरफ विदेशी दबाव है और दूसरी तरफ अपने संसाधनों पर खुद का अधिकार बनाए रखने की जद्दोजहद। यह लड़ाई सिर्फ मादुरो की नहीं, बल्कि उस सोच की है जो यह तय करेगी कि आने वाले समय में दुनिया पर एक ही मुद्रा और एक ही ताकत का राज रहेगा या नहीं।
आखिर में सबसे बड़ा सवाल यही बचता है कि क्या वेनेजुएला की जनता अपने तेल और संसाधनों का इस्तेमाल अपनी भलाई के लिए कर पाएगी, या फिर इतिहास एक बार फिर खुद को दोहराएगा, जहां ताकतवर देशों के हित आम लोगों की उम्मीदों पर भारी पड़ जाते हैं।
written by :- Anjali Mishra
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