महारानी लक्ष्मीबाई की सातवीं पीढ़ी के वंशज, श्रीमंत योगेश राव नेवालकर का दर्द सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि उस समाज और व्यवस्था की चुभन भी है जिसने इतिहास के सबसे गौरवशाली परिवारों में से एक को वह सम्मान कभी नहीं दिया जिसके वे पात्र थे। स्वतंत्रता के 75 से अधिक वर्षों बाद भी झांसी की रानी के परिवार को न तो राजकीय पहचान मिली और न सांस्कृतिक सम्मान। योगेश राव बताते हैं कि आज़ादी के बाद से अब तक उन्हें सिर्फ नाम भर की विरासत मिली है, पर वह गरिमा और प्रतिष्ठा कभी नहीं दी गई जो लक्ष्मीबाई की शहादत के बाद इस परिवार का हक था।
सबसे ज्यादा पीड़ा उन्हें उस समय हुई जब उन्हें अपने ही पूर्वजों के किले झांसी किला और रानी महल में प्रवेश करने के लिए लाइन में लगकर टिकट खरीदना पड़ा। यह वही स्थान है जहाँ कभी उनकी पूर्वज रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों के खिलाफ वीरता की अमर गाथा लिखी थी। लेकिन उनके वंशज को वहीं प्रवेश शुल्क देना पड़ा, मानो वह इतिहास से नहीं, पर्यटन स्थल से जुड़ी कोई औपचारिकता पूरी कर रहे हों। 2017-18 में जब वे अपनी पत्नी के साथ झांसी आए थे, तब भी स्थिति वही थी टिकट लेकर अंदर जाना पड़ा। यह अनुभव उन्हें आज भी कसक की तरह याद है।
योगेश राव बताते हैं कि यह केवल निजी अपमान नहीं बल्कि पूरे राष्ट्र के इतिहास के प्रति लापरवाही है। जिस रानी ने देश के लिए अपना जीवन न्योछावर कर दिया, उनके परिवार की आज पहचान भी लोगों को ठीक से नहीं मालूम। उनका कहना है कि अगर देश उनकी वीरता पर गर्व करता है, तो उनके वंशजों को भी सम्मान मिलना चाहिए, न कि उन्हें भी आम पर्यटक जैसी स्थिति का सामना करना पड़े।
नागपुर में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में काम कर रहे योगेश राव का सबसे बड़ा सपना है कि महारानी लक्ष्मीबाई से जुड़ी हर विरासत चाहे वह उनकी तलवार हो, उपयोग किए गए सामान हों या युद्ध से जुड़े दस्तावेज़ सब झांसी में ही संरक्षित हों। आज इन वस्तुओं का अधिकांश हिस्सा देशभर के विभिन्न संग्रहालयों में बिखरा हुआ है, जिससे असली इतिहास की झलक भी बिखरी हुई नजर आती है। वे चाहते हैं कि इन ऐतिहासिक धरोहरों को एक ही स्थान पर सुरक्षित रखा जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ उस वास्तविक इतिहास को महसूस कर सकें जिसने भारत की आज़ादी की नींव रखी।
उनका मानना है कि झांसी की पहचान सिर्फ एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि राष्ट्रवादी भावना और बलिदान की धरोहर है। ऐसे में रानी लक्ष्मीबाई के परिवार को उचित सम्मान और पहचान देना देश के गौरव को और भी ऊँचा करेगा। सरकार और स्थानीय प्रशासन यदि इस दिशा में कदम बढ़ाए तो झांसी न सिर्फ ऐतिहासिक रूप से, बल्कि भावनात्मक रूप से भी करोड़ों भारतीयों के लिए एक केंद्र बन सकता है।
योगेश राव की पीड़ा एक सवाल भी उठाती है क्या हम अपने इतिहास के नायकों और उनके वंशजों को वह सम्मान दे पा रहे हैं, जो वे सच में deserve करते हैं? अगर नहीं, तो यह समय है कि उनके योगदान को नए सिरे से समझा जाए और उन्हें वह स्थान दिया जाए जो भारत के गौरव में हमेशा चमकता रहे।
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