पश्चिम बंगाल में चुनाव नतीजों के बाद सियासी माहौल के साथ-साथ हालात भी तनावपूर्ण हो गए हैं। कोलकाता और आसनसोल जैसे इलाकों में हिंसा, आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आई हैं, जहां तृणमूल कांग्रेस के दफ्तरों को निशाना बनाया गया।
इन घटनाओं के बाद भारत निर्वाचन आयोग ने सख्त रुख अपनाते हुए हिंसा में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। प्रशासन को हालात पर तुरंत काबू पाने के लिए अलर्ट किया गया है।
इसी बीच राजनीतिक मोर्चे पर बड़ा मोड़ तब आया जब भारतीय जनता पार्टी ने राज्य में बड़ी जीत हासिल करने का दावा किया और सत्ता परिवर्तन की स्थिति बनती नजर आई। लेकिन मौजूदा मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने साफ कर दिया कि वह इस्तीफा नहीं देंगी।
ममता बनर्जी के इस बयान ने एक बड़ा संवैधानिक सवाल खड़ा कर दिया है क्या कोई मुख्यमंत्री चुनाव हारने के बाद भी अपने पद पर बना रह सकता है? इसका जवाब भारतीय संविधान में मिलता है।
संविधान के अनुच्छेद 164 के अनुसार मुख्यमंत्री तब तक पद पर बने रहते हैं, जब तक उन्हें राज्यपाल का विश्वास और विधानसभा में बहुमत प्राप्त हो। यानी असली शक्ति बहुमत के आंकड़े पर निर्भर करती है।
अगर चुनाव में किसी दूसरी पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिल जाता है, तो परंपरा और संवैधानिक व्यवस्था के तहत मौजूदा मुख्यमंत्री को इस्तीफा देना होता है, ताकि नई सरकार का गठन हो सके।
लेकिन अगर मुख्यमंत्री इस्तीफा देने से इनकार करते हैं, तो ऐसी स्थिति में राज्यपाल की भूमिका अहम हो जाती है। राज्यपाल मुख्यमंत्री से इस्तीफा मांग सकते हैं या फिर बहुमत हासिल करने वाले दल के नेता को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर सकते हैं।
इस दौरान मौजूदा सरकार “कार्यवाहक सरकार” (caretaker government) के रूप में सीमित अधिकारों के साथ काम करती है और बड़े नीतिगत फैसले नहीं ले सकती।
कुल मिलाकर, बंगाल में मौजूदा हालात सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि संवैधानिक बहस का भी विषय बन गए हैं जहां एक तरफ सत्ता परिवर्तन की स्थिति है, तो दूसरी तरफ पद पर बने रहने की जिद, जिसने पूरे मामले को और पेचीदा बना दिया है।
written by:- Anjali Mishra
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