अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार हो रहे उतार-चढ़ाव और मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव का असर अब सीधे भारत के घरेलू बाजार पर दिखने लगा है। वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता बढ़ने के साथ ही सप्लाई चेन पर भी दबाव बन रहा है, जिसका सीधा असर पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर पड़ रहा है। यही वजह है कि भारत में ईंधन के दाम एक बार फिर बढ़ा दिए गए हैं, जिससे आम लोगों की चिंता बढ़ गई है।
सरकारी तेल विपणन कंपनियों ने मंगलवार सुबह पेट्रोल और डीजल दोनों के दामों में करीब 90 पैसे प्रति लीटर की बढ़ोतरी कर दी है। यह बढ़ोतरी अचानक नहीं आई है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय संकेतों और कच्चे तेल की बढ़ती लागत का परिणाम बताई जा रही है। हालांकि, आम उपभोक्ताओं के लिए यह बदलाव सीधा आर्थिक बोझ लेकर आया है।
यह बढ़ोतरी इसलिए भी ज्यादा असर डाल रही है क्योंकि इससे पहले सिर्फ कुछ दिनों पहले ही कीमतों में बड़ा बदलाव किया गया था। 15 मई को भी पेट्रोल और डीजल के दामों में लगभग 3 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई थी। ऐसे में एक ही महीने में लगातार बढ़ोतरी ने लोगों के घरेलू बजट को हिला कर रख दिया है।
दो बार लगातार दाम बढ़ने से ट्रांसपोर्ट से लेकर रोजमर्रा की चीजों तक महंगाई का असर महसूस किया जाने लगा है। क्योंकि ईंधन की कीमतें बढ़ने का सीधा असर माल ढुलाई, सब्जियों, अनाज और अन्य जरूरी वस्तुओं की लागत पर भी पड़ता है। धीरे-धीरे यह दबाव हर सेक्टर में दिखाई देने लगता है।
मिडिल ईस्ट में चल रहे तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को और अस्थिर कर दिया है। तेल उत्पादक देशों की आपूर्ति और भविष्य की संभावनाओं को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है, जिसके कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊपर-नीचे हो रही हैं। यही अस्थिरता भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर सीधा असर डालती है।
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल का आयात करता है, ऐसे में अंतरराष्ट्रीय कीमतों में हर छोटा बदलाव भी घरेलू बाजार में असर दिखाता है। जब वैश्विक स्तर पर कच्चा तेल महंगा होता है, तो सरकारी तेल कंपनियों के पास भी कीमतें बढ़ाने के अलावा सीमित विकल्प ही बचते हैं।
आम जनता के लिए यह स्थिति और मुश्किल इसलिए बन जाती है क्योंकि ईंधन सिर्फ एक जरूरत नहीं बल्कि हर आर्थिक गतिविधि की रीढ़ है। चाहे वह निजी वाहन हो, सार्वजनिक परिवहन हो या फिर माल ढुलाई, हर जगह ईंधन की भूमिका अहम होती है। इसलिए पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर पूरे अर्थव्यवस्था पर महसूस किया जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में तनाव और कच्चे तेल की कीमतें इसी तरह बनी रहीं तो आने वाले दिनों में और भी बदलाव देखने को मिल सकते हैं। ऐसे में सरकार और तेल कंपनियों के लिए संतुलन बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बन सकता है।
फिलहाल आम उपभोक्ताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती बढ़ती कीमतों के बीच अपने मासिक बजट को संतुलित रखने की है। एक तरफ जरूरी खर्च बढ़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ आय में उसी अनुपात में वृद्धि नहीं हो रही। ऐसे में पेट्रोल-डीजल की यह नई बढ़ोतरी लोगों की जेब पर सीधा और भारी असर डाल रही है, और आने वाले दिनों में इसका असर और गहराने की आशंका जताई जा रही है।
written by:- Anjali Mishra
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