उत्तर प्रदेश के कई जिलों में करोड़ों रुपये की दवाएं, सिरिंज और इंट्रावेनस फ्लूइड जैसी चिकित्सकीय सामग्री बिना किसी लैब टेस्टिंग के सीधे मरीजों पर इस्तेमाल की गईं। ये दवाएं अलग-अलग जिलों के जिला अस्पतालों और मुख्य चिकित्सा अधिकारियों (CMO) के स्तर से खरीदी गई थीं। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की ऑडिट रिपोर्ट में यह गंभीर चूक उजागर हुई है।
ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2020-21 से 2023-24 के बीच राज्य के विभिन्न जिलों में औषधि और रसायन मद से कुल ₹926 करोड़ की खरीद हुई। लेकिन इन दवाओं को प्रयोग में लाने से पहले न तो कोई गुणवत्ता परीक्षण कराया गया और न ही फर्मों से संबंधित प्रमाणपत्र प्राप्त किए गए।
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CAG की जांच में सामने आया कि दवा की आपूर्ति के बाद न तो ड्रग इंस्पेक्टरों ने सैंपलिंग की और न ही अस्पतालों ने किसी अधिकृत एजेंसी से जांच कराई। ऑडिट आपत्ति में यह भी स्पष्ट किया गया कि जिला अस्पतालों और CMOs द्वारा खरीदी गई दवाओं के साथ नेशनल एक्रिडिटेशन बोर्ड फॉर टेस्टिंग एंड कैलिब्रेशन लैबोरेटरीज (NABL) के प्रमाणपत्र नहीं थे।
जब CAG ने इस संबंध में स्पष्टीकरण मांगा, तो स्वास्थ्य विभाग ने तर्क दिया कि DvDMM पोर्टल पर पंजीकृत फर्मों से ही दवाएं खरीदी गई थीं और वे गुणवत्तापूर्ण मानी जाती हैं। लेकिन ऑडिट टीम ने इस तर्क को खारिज कर दिया।
वहीं, ड्रग इंस्पेक्टरों को अस्पताल के स्टोर से स्वयं सैंपल लेने का अधिकार नहीं है और अस्पताल प्रशासन द्वारा सैंपल भिजवाने की भी कोई व्यवस्था नहीं है। ऐसे में जो दवाएं सप्लायर फर्म से आती थीं, उन्हें बिना जांच के सीधे मरीजों को दे दिया जाता था।
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सूत्रों के अनुसार, कई बार इन स्थानीय फर्मों पर घटिया गुणवत्ता की दवाएं सप्लाई करने के आरोप भी लगे हैं। जानकारों का मानना है कि यह लापरवाही केवल सिस्टम की खामी नहीं, बल्कि कमीशन खोरी का नतीजा भी हो सकती है।
इससे पहले किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) में भी बिना लैब जांच के दवाओं के इस्तेमाल पर सवाल उठ चुके हैं। इसके बाद KGMU प्रशासन ने निजी लैब से दवाओं की सैंपलिंग की प्रक्रिया शुरू की थी। लेकिन अभी तक राज्य के अन्य जिला अस्पतालों और CMOs के स्तर से कोई ऐसी पहल नहीं की गई है।
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