लखनऊ नगर निगम में उस समय हड़कंप मच गया जब कूड़ा प्रबंधन से जुड़े 160 सफाई कर्मचारी अचानक काम छोड़कर गायब हो गए। मामला तब सामने आया जब उनसे आधार कार्ड सहित नागरिकता साबित करने वाले दस्तावेज़ मांगे गए। दस्तावेज़ दिखाने की बात सुनते ही पूरा स्टाफ एक झटके में दफ्तर से बाहर निकल गया और फिर लौटकर नहीं आया। इस घटना ने प्रशासन को भी चौंका दिया और अब इस गायब हुई पूरी टीम के पीछे बड़े सवाल खड़े हो गए हैं।
महापौर सुषमा खर्कवाल ने बताया कि ये कर्मचारी सीधे नगर निगम के नहीं, बल्कि कूड़ा उठाने का काम करने वाली एक प्राइवेट कंपनी से जुड़े हुए थे। लंबे समय से ये कर्मचारी शहर में सफाई और कूड़ा संग्रह का काम कर रहे थे, लेकिन अचानक उनकी पहचान पर संदेह तब हुआ जब कई कर्मचारी अपने दस्तावेज़ प्रस्तुत करने में हिचकते दिखाई दिए। जैसे ही पहचान पत्र की जांच शुरू हुई, पूरा समूह वहां से बिना बताए गायब हो गया।
नगर निगम अधिकारियों का कहना है कि इन कर्मचारियों ने अपनी पहचान असम निवासी के रूप में बताई थी, लेकिन जब दस्तावेज़ मांगे गए तो इनकी जानकारी संदिग्ध लगने लगी। कुछ अधिकारियों ने संदेह जताया कि इनमें से कई लोग रोहिंग्या या बांग्लादेशी हो सकते हैं, जो फर्जी पहचान के सहारे नौकरी कर रहे थे। यही वजह है कि नगर निगम ने तुरंत आधार, आईडी और नागरिकता संबंधी कागज़ की जांच शुरू की, जिसके बाद कर्मचारियों की यह रहस्यमयी फरारी सामने आई।
अब प्रशासन ने एनआरसी से जुड़े दस्तावेज़ों की भी जांच शुरू कर दी है, ताकि पता चल सके कि आखिर ये लोग भारत के नागरिक हैं या फर्जी पहचान के सहारे नौकरी हासिल कर रहे थे। अगर इनमें से कोई विदेशी नागरिक निकलता है, तो पूरे मामले की दिशा बदल सकती है और बड़ी सुरक्षा चूक सामने आ सकती है। जांच एजेंसियों की नजर अब कंपनी और उसके भर्ती प्रक्रिया पर भी टिकी है कौन इन्हें काम पर रख रहा था, किसने पहचान की पुष्टि की और किन दस्तावेजों के आधार पर इनकी एंट्री हुई?
नगर निगम के भीतर अब कई सवाल गूंज रहे हैं ये 160 लोग कौन थे? क्या इनके पीछे कोई संगठित नेटवर्क था? क्या और जगहों पर भी ऐसे ही कर्मचारी बिना वैध पहचान के काम कर रहे हैं? अफसरों का कहना है कि अगर ये मामला सिर्फ अवैध नागरिकता तक सीमित नहीं है, तो सुरक्षा एजेंसियों को भी इसमें शामिल होना पड़ेगा। ऐसे कर्मचारियों का शहर के संवेदनशील इलाकों में काम करना बड़ा जोखिम बन सकता था।
स्थानीय लोग भी इस घटना को लेकर हैरान हैं। शहर में सफाई का काम करने वाले कर्मचारियों की इतनी बड़ी संख्या का अचानक ग़ायब हो जाना कई नई चिंताएं पैदा कर रहा है। कुछ लोग इसे प्रशासन की लापरवाही बता रहे हैं, जबकि कुछ लोग इसे एक बड़े रैकेट का संकेत मान रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा तेजी से चर्चा में है, जहां इसे शहर की सुरक्षा और पहचान सत्यापन की कमजोरियों से जोड़कर देखा जा रहा है।
कंपनी जिसने इन कर्मचारियों को काम पर रखा था, उससे भी पूछताछ की जा रही है कि क्या उसने जॉइनिंग के समय सही तरीके से दस्तावेज़ों की जांच की थी। अब सवाल यह भी है कि अगर इन कर्मचारियों के पास नागरिकता के असली कागज़ नहीं हैं, तो इतने महीनों या सालों तक ये बिना पकड़े कैसे काम करते रहे? क्या निगम को पहले से कुछ पता था या यह मामला पूरी तरह अप्रत्याशित था?
जांच एजेंसियों का कहना है कि इस पूरे मामले की परतें अभी खुलनी बाकी हैं। 160 लोग बिना बताए गायब हो जाना सिर्फ नौकरी छोड़ने की बात नहीं लगती, बल्कि एक संगठित तरीके की ओर इशारा करती है। अब निगम की टीम इन सभी के ठिकाने, पते और असली पहचान जुटाने में लगी है, लेकिन अब तक कोई ठोस जानकारी सामने नहीं आई है।
लखनऊ में इस अचानक हुई “सफाईकर्मी एक्सोडस” ने शहर के प्रशासन, सुरक्षा और पहचान सत्यापन प्रणाली को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आगे की जांच में क्या निकलकर आता है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा क्योंकि मामला सिर्फ नौकरी का नहीं, बल्कि पहचान, सुरक्षा और सिस्टम की पारदर्शिता का है।
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