सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव, सांसद डिंपल यादव, इकरा हसन और अन्य पार्टी नेताओं के संसद परिसर स्थित मस्जिद में जाने को लेकर अब एक बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। यह दौरा एक सामान्य धार्मिक आस्था की अभिव्यक्ति के रूप में किया गया था, लेकिन भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इसे राजनीतिक रंग देते हुए तंज और सवालों की झड़ी लगा दी। बीजेपी के कुछ नेताओं ने इस कदम को “प्रदर्शनात्मक राजनीति” बताया, तो कुछ ने इसे “धार्मिक ध्रुवीकरण की कोशिश” कहकर निशाना साधा। हालांकि, यह पहला मौका नहीं है जब राजनीतिक दलों के धार्मिक स्थलों पर जाने को लेकर सवाल उठे हों, लेकिन इस बार जिस तीव्रता से प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं, उसने संसद के अंदर की सादगी को बाहर सियासी तूफान में बदल दिया है।
बीजेपी के इन आरोपों और टिप्पणियों का करारा जवाब देते हुए सपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता अमीक जामेई ने भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जमाल सिद्दीकी को एक औपचारिक पत्र लिखा है। इस पत्र में जामेई ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मस्जिद में जाना एक व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता का मामला है, न कि कोई राजनीतिक प्रदर्शन। उन्होंने पूछा कि क्या बीजेपी यह मानती है कि मुस्लिम सांसदों या नेताओं को संसद परिसर में स्थित धार्मिक स्थलों पर जाने का हक नहीं है? क्या यह भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की भावना के खिलाफ नहीं है? सपा ने इस पूरे घटनाक्रम को धार्मिक असहिष्णुता और संविधान में प्रदत्त धार्मिक अधिकारों के उल्लंघन की कोशिश करार दिया है।
पत्र में अमीक जामेई ने यह भी लिखा कि यदि कोई सांसद गुरुद्वारे, चर्च या मंदिर में जाकर प्रार्थना करता है, तो उसे श्रद्धा और व्यक्तिगत आस्था का विषय माना जाता है। लेकिन जब कोई मुस्लिम नेता मस्जिद जाता है, तो उस पर संदेह और राजनीतिक चश्मे से क्यों देखा जाता है? क्या यह दोहरा मापदंड नहीं है? सपा प्रवक्ता ने कहा कि यह रवैया न केवल अल्पसंख्यक समुदाय की भावनाओं को आहत करता है, बल्कि देश की सांप्रदायिक एकता को भी चुनौती देता है। उन्होंने भाजपा से आग्रह किया कि वह इस मुद्दे पर स्पष्ट रुख अपनाए और बताएं कि क्या वह भारतीय संविधान में निहित धार्मिक स्वतंत्रता के सिद्धांतों को मानती है या नहीं।
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इस विवाद के बढ़ने के बाद देशभर के सामाजिक और राजनीतिक हलकों में इस मुद्दे पर तीखी बहस छिड़ गई है। कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद बीजेपी की ध्रुवीकरण की राजनीति का हिस्सा है, जबकि कुछ ने इसे विपक्ष को धार्मिक मुद्दों में उलझाकर असल जन मुद्दों से भटकाने की रणनीति बताया है। सोशल मीडिया पर भी इस विषय ने जोर पकड़ लिया है। कई यूज़र्स और राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने सपा नेताओं के मस्जिद जाने को उनके संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग बताया है और बीजेपी की आलोचना की है। वहीं, कुछ समर्थक इसे “जनभावनाओं से जुड़ने की राजनीति” कहकर सपा की भी आलोचना कर रहे हैं।
बहरहाल, यह पूरा घटनाक्रम एक बार फिर इस बात को उजागर करता है कि भारत की राजनीति में धर्म और आस्था के विषय किस तरह से राजनीतिक हथियार बना दिए गए हैं। संसद जैसी संस्था, जहां देश के नीति निर्धारण की बात होनी चाहिए, वहां धार्मिक गतिविधियों पर राजनीतिक बयानबाज़ी का माहौल बनाना लोकतांत्रिक मूल्यों को कमज़ोर करता है। सपा द्वारा उठाए गए सवाल अब बीजेपी के लिए जवाबदेही का विषय बन चुके हैं, और देखना होगा कि आने वाले दिनों में इस बहस का रुख क्या मोड़ लेता है — क्या यह संवाद की ओर बढ़ेगा या सियासी संघर्ष और गहराएगा। एक लोकतांत्रिक देश में आस्था और राजनीति के बीच संतुलन बनाए रखना ही सच्चे राष्ट्रवाद की पहचान है।
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