जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान से सभी प्रकार के संबंध तोड़ने का निर्णय लिया है। पाकिस्तान की लगातार उकसाने वाली हरकतों ने भारत को इस कठोर कदम के लिए मजबूर कर दिया है।
जहां एक ओर भारत और पाकिस्तान के रिश्ते सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए हैं, वहीं दूसरी ओर भारत और चीन के रिश्तों में हल्का सुधार देखने को मिला है। हालाँकि, तिब्बत को लेकर दोनों देशों के बीच लंबे समय से तनाव रहा है। चीन तिब्बत को अपना स्वायत्त क्षेत्र मानता है, जबकि भारत तिब्बत को एक स्वतंत्र सांस्कृतिक इकाई मानते हुए दलाई लामा को शरण देता है।
पहलगाम हमले के बाद चीन ने दिखावे के तौर पर पाकिस्तान का समर्थन नहीं किया, लेकिन पर्दे के पीछे की हकीकत कुछ और ही है। चीन आज भी पाकिस्तान का साथ दे रहा है—खासतौर पर चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के ज़रिए।
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गौरतलब है कि पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में दो इलाके हैं: गिलगित और बल्तिस्तान। पाकिस्तान इन्हें “गिलगित-बल्तिस्तान” कहता है और इन्हें केंद्र शासित क्षेत्र का दर्जा देने की कोशिश करता है, लेकिन भारत इन्हें अपना अभिन्न हिस्सा मानता है। भारत ने 2019 में स्पष्ट कर दिया था कि पूरा जम्मू-कश्मीर, जिसमें गिलगित-बल्तिस्तान भी शामिल है, भारत का अभिन्न अंग है और उसे लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश के तहत दिखाया गया है।
इसी गिलगित-बल्तिस्तान क्षेत्र से होकर चीन एक रणनीतिक सड़क—CPEC—निर्माण कर रहा है, जो उसे सीधे पाकिस्तान के बंदरगाहों से जोड़ती है। यह गलियारा लगभग 2000 किलोमीटर लंबा है और पाकिस्तान के ग्वादर व कराची बंदरगाहों को चीन के शिनजियांग क्षेत्र से जोड़ता है। इसका मुख्य उद्देश्य पाकिस्तान की परिवहन और ऊर्जा व्यवस्था को आधुनिक बनाना और चीन के व्यापार को समुद्री रास्तों से हटाकर स्थलीय मार्गों पर केंद्रित करना है।
CPEC के माध्यम से चीन पाकिस्तान को एक व्यापारिक केंद्र में तब्दील करना चाहता है, ताकि उसे हांगकांग या दूसरे समुद्री मार्गों की आवश्यकता न रहे। यही कारण है कि भारत CPEC का लगातार विरोध करता रहा है।
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