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आजम खां बोले – जेल बदलते वक्त था एनकाउंटर का डर !

समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता और उत्तर प्रदेश की राजनीति के बड़े चेहरों में शुमार आजम खां ने हाल ही में वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल से हुई बातचीत में अपने जेल के दिनों की पीड़ा और भयावह अनुभवों को साझा किया। बातचीत के दौरान आजम खां भावुक हो उठे और उन्होंने बताया कि जेल में बिताए गए दिन उनके जीवन के सबसे कठिन और दर्दनाक पल थे। उन्होंने कहा कि सत्ता और राजनीति के खेल में उन्होंने बहुत कुछ सहा, लेकिन जिस तरह से उन्हें और उनके परिवार को प्रताड़ित किया गया, वह किसी साजिश से कम नहीं था। आजम ने कहा कि राजनीति में विरोध होना स्वाभाविक है, लेकिन जब किसी को उसके विचारों या आवाज़ के लिए सज़ा दी जाए, तो वह लोकतंत्र के लिए एक चिंताजनक संकेत है।

आजम खां ने विस्तार से बताया कि जब उन्हें रामपुर जेल से सीतापुर जेल स्थानांतरित किया जा रहा था, तब उन्हें अपनी जान का भय सताने लगा था। उन्होंने कहा कि रास्ते में जो माहौल था, वह बेहद तनावपूर्ण और भयावह था। उन्हें और उनके बेटे अब्दुल्ला आजम को अलग-अलग गाड़ियों में भेजा गया था, और उस वक्त उनके मन में केवल एक ही डर था—कहीं रास्ते में किसी “एनकाउंटर” का शिकार न बना दिया जाए। उन्होंने कहा कि जेल की गाड़ियों में सन्नाटा था, पुलिसकर्मियों के चेहरे पर ठंडा भाव था, और उस यात्रा के हर पल में उन्हें ऐसा महसूस हो रहा था जैसे मौत उनकी ओर बढ़ रही हो।

आजम खां ने बताया कि उस समय उनके मन में केवल एक पिता की भावना थी—अब्दुल्ला की सुरक्षा की। उन्होंने कहा, “मैं खुद से ज्यादा अपने बेटे के लिए डरा हुआ था। वह युवा है, जोश में है, और मैं जानता था कि सत्ता उसके खिलाफ भी उतनी ही सख्त है जितनी मेरे खिलाफ।” आजम ने कहा कि जब वह सीतापुर जेल पहुंचे और यह सुनिश्चित हुआ कि उनका बेटा भी सुरक्षित पहुंच गया है, तभी जाकर उन्होंने राहत की सांस ली। उन्होंने बताया कि वह पल उनके लिए किसी पुनर्जन्म जैसा था—जहां डर, दर्द और असहायता ने उन्हें अंदर तक तोड़ दिया था।

कपिल सिब्बल से बातचीत के दौरान आजम खां ने यह भी कहा कि जेल में बिताए दिनों ने उन्हें बहुत कुछ सिखाया। उन्होंने कहा कि जेल के भीतर उन्होंने यह समझा कि सत्ता चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, इंसान की आत्मा को नहीं तोड़ा जा सकता। उन्होंने वहां गरीब, दलित और कमजोर लोगों के दर्द को नज़दीक से देखा और महसूस किया कि न्याय की लड़ाई केवल अदालतों में नहीं, बल्कि समाज के हर कोने में लड़ी जानी चाहिए। आजम ने कहा कि उन्होंने जेल में किताबें पढ़ीं, कुरान का अध्ययन किया और खुद से गहराई से संवाद किया, जिससे उन्हें मानसिक मजबूती मिली।

अंत में आजम खां ने इस पूरे अनुभव को एक राजनीतिक नहीं, बल्कि मानवीय परीक्षा बताया। उन्होंने कहा कि उन्होंने राजनीति में हमेशा धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय की बात की, और शायद यही उनके खिलाफ सबसे बड़ा अपराध माना गया। आजम ने कहा कि आज भी उनके खिलाफ कई मुकदमे चल रहे हैं, लेकिन अब उन्हें किसी सज़ा का भय नहीं है, क्योंकि उन्होंने डर के सबसे अंधेरे दौर को पार कर लिया है। उन्होंने यह भी कहा कि वह आगे भी अन्याय और अत्याचार के खिलाफ अपनी आवाज़ उठाते रहेंगे, चाहे कीमत कुछ भी क्यों न हो। यह बयान न केवल एक राजनेता की व्यथा को उजागर करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि सत्ता की राजनीति में इंसानियत कितनी बार कुचली जाती है।

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