सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु बनाम तमिलनाडु के राज्यपाल मामले में एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है, जिससे भारतीय संघीय ढांचे और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को नया आयाम मिला है। अदालत ने स्पष्ट किया कि न तो राष्ट्रपति और न ही राज्यपाल को विधायिका द्वारा पारित विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए असीमित समय दिया जा सकता है।
मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि यदि राष्ट्रपति या राज्यपाल किसी विधेयक पर जानबूझकर निर्णय लेने में देरी करते हैं, तो यह ‘निष्क्रियता’ मानी जाएगी और इसे न्यायिक समीक्षा के दायरे में लाया जा सकता है।
अदालत ने कहा कि इस प्रकार की अनिश्चितकालीन चुप्पी लोकतांत्रिक प्रणाली के खिलाफ है और इससे निर्वाचित सरकारों के कार्य करने की स्वतंत्रता बाधित होती है। कोर्ट ने माना कि राज्यपाल का कार्य सलाह और मंत्रिमंडल की सहायता से काम करना है, न कि निर्वाचित सरकार को बाधित करना।
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यह फैसला तमिलनाडु सरकार द्वारा दायर याचिका पर आया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि राज्यपाल आर. एन. रवि द्वारा कई विधेयकों को लंबे समय तक लंबित रखा गया, जिससे प्रशासनिक कार्यों में रुकावट आई।
इस फैसले से यह संदेश स्पष्ट गया है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं में संतुलन और जवाबदेही अत्यंत आवश्यक है, और संवैधानिक पदों पर बैठे लोग इस जिम्मेदारी से बच नहीं सकते।
