उत्तर प्रदेश की सत्ता से बहुजन समाज पार्टी को 13 साल हो चुके हैं। 2012 के बाद से पार्टी लगातार सियासी वनवास में है। हर चुनाव में बसपा का जनाधार थोड़ा और खिसकता गया, यहां तक कि मौजूदा विधानसभा में पार्टी का सिर्फ एक विधायक बचा है और लोकसभा में एक भी प्रतिनिधित्व नहीं है। ऐसे में मायावती अब मिशन 2027 के तहत अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन फिर से हासिल करने की रणनीति में जुट गई हैं।
बसपा ने तय किया है कि 2027 विधानसभा चुनाव तक पार्टी को धार दी जाएगी और पुराने जनाधार को फिर से जोड़ा जाएगा। इसके लिए मायावती के नेतृत्व में प्रदेश की पूर्व सरकारों द्वारा पिछड़ों और अति पिछड़ों के लिए किए गए कार्यों को ग्रामीण चौपालों में गिनाया जा रहा है। इसके साथ ही हर जिले में 100 से 150 अति पिछड़े और पिछड़े वर्ग के लोगों को संगठन की जिला कार्यकारिणी में शामिल करने का लक्ष्य रखा गया है।
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मार्च 2025 में मायावती ने फिर से “भाईचारा कमेटी” को सक्रिय किया, ताकि सामाजिक समरसता का संदेश दिया जा सके। वहीं, मई से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय महासचिव बाबू मुनकाद अली संगठन की कमान संभाले हुए हैं। वह प्रतिदिन दो से तीन जिलों का दौरा कर बूथ और सेक्टर स्तर पर संगठन को सक्रिय कर रहे हैं। उनका कहना है कि 2027 में बसपा संगठन के दम पर सत्ता में वापसी करेगी और मायावती एक बार फिर मुख्यमंत्री बनेंगी।
बसपा कार्यकर्ताओं को 2007 का स्वर्णिम इतिहास याद दिलाया जा रहा है जब मायावती ने सभी वर्गों को साथ लेकर बहुमत की सरकार बनाई थी और 403 में से 206 सीटें जीती थीं। कार्यकर्ता मानते हैं कि 2007 से 2012 तक प्रदेश में न्यायपूर्ण शासन था, जबकि 2012 से 2017 में सपा की गुंडागर्दी और 2017 के बाद से बीजेपी की सांप्रदायिक राजनीति हावी रही है। अब एक बार फिर बसपा खुद को विकल्प के रूप में खड़ा कर सत्ता में वापसी की उम्मीद कर रही है।
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