हिमालय में तेजी से बढ़ती ग्लेशियल झीलें अब सिर्फ पर्यावरणीय चिंता नहीं रहीं, बल्कि एक बड़े प्राकृतिक खतरे के रूप में सामने आ रही हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर इन झीलों में से किसी का भी अचानक विस्फोट हुआ, तो केदारनाथ और चमोली जैसे विनाशकारी हादसे दोबारा दोहराए जा सकते हैं। यह खतरा इसलिए भी गंभीर है क्योंकि हिमालयी इलाकों में लाखों लोग इन झीलों के नीचे बसे क्षेत्रों में रहते हैं।
IIT रुड़की की ताजा स्टडी ने इस खतरे को आंकड़ों के साथ और स्पष्ट कर दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2022 तक पूरे हिमालय क्षेत्र में कुल 31,698 ग्लेशियल झीलें दर्ज की जा चुकी हैं। यह संख्या अपने आप में चिंताजनक है, क्योंकि साल 2016 से 2024 के बीच इन झीलों की संख्या में करीब 5.5 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। वैज्ञानिक मानते हैं कि यह बढ़ोतरी सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन से जुड़ी हुई है।
ग्लेशियल झीलें तब बनती हैं जब ग्लेशियर तेजी से पिघलते हैं और उनके पीछे पानी जमा होने लगता है। पहले ये झीलें छोटी और सीमित थीं, लेकिन अब उनका आकार और संख्या दोनों बढ़ते जा रहे हैं। यही वजह है कि इनके टूटने की आशंका भी कई गुना बढ़ गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि एक भी झील के फटने से भारी मात्रा में पानी, मलबा और चट्टानें नीचे की ओर तबाही मचा सकती हैं।
इस अध्ययन में सबसे चिंताजनक आंकड़ा यह है कि इन संभावित ग्लेशियल झील विस्फोटों से करीब 93 लाख लोगों की जिंदगी पर सीधा खतरा मंडरा रहा है। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों में बड़ी आबादी नदियों और घाटियों के आसपास रहती है, जो सीधे तौर पर इन झीलों से जुड़े जल प्रवाह पर निर्भर और प्रभावित होती है।
वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन की रफ्तार अगर इसी तरह बनी रही, तो आने वाले वर्षों में ग्लेशियर और तेजी से पिघलेंगे। इससे न सिर्फ नई ग्लेशियल झीलें बनेंगी, बल्कि पहले से मौजूद झीलों का जलस्तर भी खतरनाक स्तर तक पहुंच सकता है। कमजोर प्राकृतिक बांधों वाली झीलें सबसे ज्यादा जोखिम में हैं।
केदारनाथ (2013) और चमोली (2021) जैसी आपदाओं ने पहले ही यह दिखा दिया है कि पहाड़ी इलाकों में ऐसी घटनाएं कितनी विनाशकारी हो सकती हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर समय रहते निगरानी और चेतावनी प्रणाली मजबूत नहीं की गई, तो भविष्य में नुकसान और भी बड़ा हो सकता है।
IIT रुड़की की रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया है कि संवेदनशील ग्लेशियल झीलों की लगातार मॉनिटरिंग की जाए। सैटेलाइट डेटा, ड्रोन सर्वे और अर्ली वॉर्निंग सिस्टम के जरिए समय रहते खतरे की पहचान की जा सकती है। इसके साथ-साथ निचले इलाकों में रहने वाली आबादी को आपदा प्रबंधन के लिए तैयार करना भी जरूरी है।
यह संकट सिर्फ हिमालय या पहाड़ी राज्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश के लिए चेतावनी है। हिमालय भारत की जल सुरक्षा की रीढ़ है, और अगर यहां असंतुलन बढ़ा, तो इसका असर नदियों, खेती और करोड़ों लोगों की जिंदगी पर पड़ेगा।
अंततः, वैज्ञानिक साफ कह रहे हैं कि यह खतरा भविष्य का नहीं, बल्कि वर्तमान का है। अगर जलवायु परिवर्तन को रोकने और हिमालयी क्षेत्र में सतर्कता बढ़ाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो ग्लेशियल झीलें आने वाले समय में एक बड़े राष्ट्रीय संकट का रूप ले सकती हैं।
written by :- Anjali Mishra
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